आरोप तय करना कोई “औपचारिक औपचारिकता” नहीं: डिस्चार्ज प्रावधानों के उल्लंघन पर हाईकोर्ट ने रद्द किया आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक धोखाधड़ी के मामले में आरोपी के खिलाफ आरोप तय करने के स्पेशल चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट (कस्टम), लखनऊ के आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के उन अनिवार्य प्रावधानों का पालन करने में विफल रहा, जो आरोपी को डिस्चार्ज (आरोपमुक्ति) के लिए आवेदन करने का अधिकार देते हैं।

यह आदेश जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने कलैया पट्टदामठ (उर्फ अक्षय पट्टदामठ) द्वारा दायर एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision) पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 336(3), 338, 340(2), 61(2) और आईटी एक्ट की धारा 66D के तहत आरोप तय किए जाने को चुनौती दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 30 जून, 2025 को लखनऊ के गोसाईंगंज थाने में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसे फेसबुक और व्हाट्सएप पर केले के पौधों की बिक्री का झांसा दिया गया। जालसाज ने विश्वास जीतने के लिए एक फर्जी “डीबीटी सर्टिफिकेट” भेजा, जिसके बाद शिकायतकर्ता ने विभिन्न बैंक खातों में कुल ₹29,25,000/- ट्रांसफर कर दिए।

जांच के दौरान यह आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता मुख्य आरोपी और उन तीन बैंक खाताधारकों के संपर्क में था, जिनके खातों में धोखाधड़ी की राशि गई थी। आरोप था कि याचिकाकर्ता ने ही मुख्य आरोपी की पहचान इन खाताधारकों से कराई थी।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील अभिनीत जायसवाल और देवव्रत प्रताप सिंह ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता कथित धोखाधड़ी की राशि का लाभार्थी नहीं था और न ही उसके खाते में कोई पैसा आया। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने BNSS की धाराओं 261, 262(2), 263 और 341 का उल्लंघन करते हुए आरोप तय किए हैं।

बचाव पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि याचिकाकर्ता जेल में था और उसे डिस्चार्ज आवेदन दाखिल करने का वैधानिक अवसर नहीं दिया गया। साथ ही, धारा 341 BNSS के तहत आरोप तय करने के चरण में उसे कोई कानूनी सहायता (Legal Aid) भी उपलब्ध नहीं कराई गई। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ यूपी बनाम सिंघारा सिंह और अन्य (1964) मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि “यदि किसी शक्ति को एक विशेष तरीके से प्रयोग करने के लिए दिया गया है, तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए अन्यथा नहीं।”

राज्य की ओर से एजीए (A.G.A.) ने पक्ष रखा और कोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन किया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने BNSS की धारा 262 का परीक्षण करते हुए नोट किया कि यह पुराने Cr.P.C. की धारा 239 के समान है, लेकिन इसमें कुछ महत्वपूर्ण जोड़ किए गए हैं। कानून के अनुसार, दस्तावेजों की प्रतियां मिलने के 60 दिनों के भीतर आरोपी डिस्चार्ज के लिए आवेदन कर सकता है।

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कोर्ट ने टिप्पणी की:

“कानून आरोपी को दस्तावेजों की आपूर्ति की तारीख से 60 दिनों के भीतर डिस्चार्ज के लिए आवेदन करने का अवसर देता है और कोर्ट के लिए भी आरोप तय करने हेतु 60 दिनों की समय सीमा निर्धारित की गई है, जो आरोप पर पहली सुनवाई की तारीख से शुरू होती है।”

कोर्ट ने पाया कि इस मामले में याचिकाकर्ता जेल में था और उसे डिस्चार्ज आवेदन देने का मौका नहीं मिला। कोर्ट ने कहा:

“ऐसी परिस्थितियों में, अदालत का यह दायित्व था कि वह आरोपी को कानूनी सहायता वकील प्रदान करे ताकि वह BNSS, 2023 की धारा 262(1) के तहत डिस्चार्ज आवेदन दाखिल कर सके…”

प्रक्रिया की गंभीरता पर जोर देते हुए कोर्ट ने स्टेट ऑफ तमिलनाडु बनाम आर. सौंदीरारासु (2023) मामले का उल्लेख करते हुए कहा:

“आरोप तय करने का आदेश कोई खाली या नियमित औपचारिकता नहीं है। यह दूरगामी प्रकृति का है और यह एक ऐसा निर्णय है कि आरोपी धारा 239 [अब धारा 262 BNSS] के तहत डिस्चार्ज का हकदार नहीं है…”

हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि 3 जनवरी, 2026 के आदेश पत्र से यह कहीं भी स्पष्ट नहीं होता कि आरोप तय करने से पहले आरोपी को सुनवाई का कोई अवसर दिया गया था।

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निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि BNSS के वैधानिक प्रावधानों का पालन न होने के कारण आरोप तय करने की प्रक्रिया दोषपूर्ण हो गई है। कोर्ट ने कहा:

“यह स्पष्ट है कि आरोप तय करने के प्रश्न पर याचिकाकर्ता को सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया गया। BNSS की धारा 262 और 263, आरोप तय करने से पहले ऐसा अवसर प्रदान करना अनिवार्य बनाती है।”

हाईकोर्ट ने 3 जनवरी, 2026 के आदेश को रद्द करते हुए मामले को वापस ट्रायल कोर्ट भेज दिया है। ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिए गए हैं कि:

  1. याचिकाकर्ता को इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करने के दो सप्ताह के भीतर डिस्चार्ज आवेदन दाखिल करने का अवसर दिया जाए।
  2. अभियोजन और याचिकाकर्ता दोनों को सुनने के बाद एक तर्कपूर्ण और विस्तृत आदेश (Reasoned and Speaking Order) पारित किया जाए।
  3. यदि ट्रायल कोर्ट को लगता है कि मामला बनता है, तभी कानून के अनुसार आरोप तय किए जाएं।

मामले का विवरण:

  • केस का शीर्षक: कलैया पट्टदामठ उर्फ अक्षय पट्टदामठ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 252 वर्ष 2026
  • बेंच: जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा
  • दिनांक: 11 मार्च, 2026

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