इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मेडिकल अटेंडेंस नियमों के नियम 16 को ‘रीड डाउन’ किया; अब कानूनी वारिस भी कर सकेंगे प्रतिपूर्ति का दावा

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि उपचार के दौरान मुख्य लाभार्थी की मृत्यु हो जाती है या वह अक्षम हो जाता है, तो उसके कानूनी वारिस मेडिकल प्रतिपूर्ति (reimbursement) का दावा करने के हकदार हैं। न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि दावों को केवल “लाभार्थी” तक सीमित रखना मनमाना है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता चंद्र चूड सिंह ने अपने पिता रुद्र प्रताप सिंह के इलाज के लिए किए गए मेडिकल प्रतिपूर्ति दावे को खारिज करने के निर्णय को चुनौती दी थी। उनके पिता, जो सेवानिवृत्त डिप्टी रजिस्ट्रार थे, का 30 जुलाई, 2017 से 26 अगस्त, 2017 तक लखनऊ के निजी अस्पतालों में इलाज चला और 28 अगस्त, 2017 को उनका निधन हो गया।

पिता की मृत्यु के बाद, याचिकाकर्ता ने उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (चिकित्सा परिचर्या) नियमावली, 2011 के तहत प्रतिपूर्ति के लिए आवेदन किया। हालांकि मुख्य चिकित्सा अधिकारी, गोरखपुर ने लगभग ₹12.18 लाख के दावे को सत्यापित किया था, लेकिन डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (रजिस्ट्रेशन) ने 9 मई, 2019 को इसे खारिज कर दिया। अस्वीकृति का आधार यह था कि याचिकाकर्ता “लाभार्थी” की परिभाषा में नहीं आते थे और उनका उत्तराधिकार प्रमाणपत्र केवल ₹5,000 तक सीमित था। यू.पी. राज्य लोक सेवा अधिकरण के निर्देश के बाद दोबारा विचार करने पर भी 10 जनवरी, 2023 को दावे को फिर से उन्हीं आधारों पर खारिज कर दिया गया, जिसके बाद यह रिट याचिका दायर की गई।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए श्री सुमीत ताहिलरमानी और सुश्री आहुति अग्रवाल ने तर्क दिया कि 2011 के नियमों का नियम 16 मनमाना है क्योंकि यह उन स्थितियों पर विचार नहीं करता जहाँ उपचार के दौरान सरकारी सेवक की मृत्यु हो जाती है। उन्होंने तर्क दिया कि कानूनी वारिसों को दावे से बाहर रखना उन लाभार्थियों के साथ भेदभाव है जो उपचार के दौरान जीवित नहीं रहते या अक्षम हो जाते हैं।

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राज्य की ओर से विद्वान स्थायी अधिवक्ता (C.S.C.) ने आदेश का बचाव करते हुए कहा कि प्रतिपूर्ति का अधिकार पूरी तरह से 2011 के नियमों के अधीन है। नियम 3(b) के तहत “लाभार्थी” केवल सरकारी सेवक, सेवानिवृत्त कर्मचारी और उनके परिवार के वे सदस्य हैं जो पारिवारिक पेंशन के पात्र हैं। राज्य का तर्क था कि चूंकि नियम 16 स्पष्ट रूप से कहता है कि “लाभार्थी” दावा प्रस्तुत करेगा, इसलिए अधिकारियों ने याचिकाकर्ता के आवेदन को सही ढंग से खारिज किया है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने पाया कि नियम 16 “अनुचित और मनमाना” प्रतीत होता है। बेंच ने टिप्पणी की कि सरकार ने उन स्थितियों पर ध्यान नहीं दिया जहाँ सरकारी सेवक की मृत्यु हो जाती है और कोई अन्य जीवित “लाभार्थी” नहीं बचता।

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हाईकोर्ट ने कहा:

“यह नहीं कहा जा सकता कि चिकित्सा व्यय प्रतिपूर्ति के योग्य नहीं होंगे… यदि सरकारी सेवक उपचार के दौरान या बीमारी के कारण दावा करने में अक्षम है, उदाहरण के लिए यदि वह कोमा (vegetative state) में है या पूरी तरह से लकवाग्रस्त है।”

कोर्ट ने अनुच्छेद 14 के तहत “तर्कसंगतता के दोहरे परीक्षण” (twin test of reasonableness) को लागू किया और द स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल बनाम अनवर अली सरकार (1952)सुकन्या शांता बनाम भारत संघ (2024) जैसे मामलों का हवाला दिया। कोर्ट ने पाया कि लाभार्थी की मृत्यु या अक्षमता की स्थिति में कानूनी वारिसों को बाहर करने का कोई उचित आधार नहीं है।

नियम की संवैधानिकता को बचाने के लिए हाईकोर्ट ने ‘रीडिंग डाउन’ (Reading Down) के सिद्धांत का उपयोग किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“‘रीडिंग डाउन’ का नियम केवल प्रावधान को कार्यक्षम बनाने और कानून के उद्देश्य को पूरा करने के सीमित उद्देश्य के लिए है।”

हाईकोर्ट ने आगे जोर दिया कि 2011 के नियम “हितकारी विधान” (beneficial legislation) हैं, जिन्हें उर्मिला दीक्षित बनाम सुनील शरण दीक्षित (2025) के अनुसार लाभार्थियों के पक्ष में उदारतापूर्वक समझा जाना चाहिए।

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उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के संबंध में कोर्ट ने कहा कि यदि कानूनी वारिस की पहचान को लेकर कोई विवाद नहीं है, तो तहसीलदार द्वारा जारी प्रमाणपत्र में दी गई मौद्रिक सीमा बड़े दावे को नहीं रोक सकती।

निर्णय

हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए 10 जनवरी, 2023 के आदेश को रद्द कर दिया। बेंच ने निर्देश दिए:

  1. 2011 के नियमों के नियम 16 को इस प्रकार पढ़ा जाएगा कि इसमें उन मामलों में कानूनी वारिसों द्वारा दावा प्रस्तुत करना शामिल हो, जहाँ लाभार्थी की मृत्यु हो जाती है या वह अक्षम हो जाता है और कोई अन्य परिभाषित लाभार्थी जीवित नहीं है।
  2. इंस्पेक्टर जनरल (रजिस्ट्रेशन) याचिकाकर्ता के दावे को नियम 16 के तहत वैध मानकर उस पर पुनर्विचार करें।
  3. यह निर्णय दो महीने के भीतर लिया जाना चाहिए और यदि दावा सही पाया जाता है, तो उसके बाद एक महीने के भीतर भुगतान किया जाना चाहिए।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: चंद्र चूड सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
  • केस नंबर: WRITA No. 12693 of 2024
  • बेंच: न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय
  • दिनांक: 11 मार्च, 2026

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