बॉम्बे हाईकोर्ट ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें एक रेल दुर्घटना में मृत व्यक्ति के परिवार को मुआवजा देने से इनकार कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चश्मदीद गवाहों या ट्रेसपासिंग (अवैध रूप से ट्रैक पार करना) के पुख्ता सबूतों के अभाव में, ऐसी घटना को समाज कल्याण कानून के तहत “अप्रिय घटना” (untoward incident) माना जाना चाहिए।
जस्टिस जितेंद्र जैन ने 18 मार्च, 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में ट्रिब्यूनल के 2014 के निर्णय को पलट दिया। हाईकोर्ट ने पश्चिमी रेलवे को निर्देश दिया है कि वह मृतक की विधवा, बेटी और माता-पिता को ब्याज सहित 4,00,000 रुपये का मुआवजा प्रदान करे।
मामले की पृष्ठभूमि
मृतक वैलेंटाइन डिसूजा नायगांव के निवासी थे और दादर में रोलेक्स कंपनी के वॉच शोरूम में कार्यरत थे। 18 मार्च, 2011 को वह अपने काम के लिए घर से निकले थे। उसी दिन बाद में, परिवार को सूचना मिली कि नायगांव और भयंदर रेलवे स्टेशनों के बीच एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई है। तलाशी के दौरान उनके पास से प्रथम श्रेणी का सीजन टिकट बरामद हुआ था।
रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल ने 28 फरवरी, 2014 को परिवार के मुआवजे के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह मामला “ट्रेसपासिंग” का है, जिसमें मृतक को किसी अज्ञात ट्रेन ने टक्कर मारी थी। ट्रिब्यूनल ने माना था कि मृतक एक “वैध यात्री” (bonafide passenger) थे, लेकिन घटना की परिस्थितियों के आधार पर इसे “अप्रिय घटना” नहीं माना।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से वकील अवधूत बिदये ने दलील दी कि रेलवे का यह निष्कर्ष गलत है कि मृत्यु ट्रैक पार करते समय हुई। उन्होंने मृतक की पत्नी के साक्ष्य का हवाला दिया, जिन्होंने मृतक की दिनचर्या और काम पर जाने के लिए स्टेशन पहुंचने की पुष्टि की थी।
वहीं, रेलवे की ओर से सीनियर एडवोकेट राजेश जी. सिंह ने तर्क दिया कि घटना के लगभग दस महीने बाद तैयार की गई पुलिस रिपोर्ट और जांच रिपोर्ट से यह साबित होता है कि यह ट्रेसपासिंग का मामला था, न कि ट्रेन से गिरने की कोई दुर्घटना।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या यह मृत्यु “अप्रिय घटना” की श्रेणी में आती है या यह “ट्रेसपासिंग” का मामला है। जस्टिस जैन ने कहा कि मृतक की पत्नी द्वारा दी गई गवाही को चुनौती नहीं दी गई है।
ट्रेन में चढ़ने के किसी चश्मदीद गवाह के न होने पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“मेरे विचार में, ट्रेन में चढ़ने का तब तक कोई सबूत नहीं हो सकता जब तक कि मृतक के साथ कोई सह-यात्री न हो या सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध न हो। इस मामले में दोनों ही मौजूद नहीं हैं। इसलिए, आवेदकों से यह साबित करने के लिए कहना कि मृतक ट्रेन में चढ़ रहा था, उन पर असंभव और अत्यधिक बोझ डालने जैसा होगा।”
ट्रेसपासिंग के आरोपों पर हाईकोर्ट ने पाया कि रेलवे के पास ऐसा कोई चश्मदीद गवाह नहीं है जो यह कह सके कि मृतक ट्रैक पार कर रहा था। हाईकोर्ट ने कहा:
“यह संभव है कि मृतक गिर गया हो और उसका शरीर उसी ट्रेन या दूसरी तरफ से आने वाली किसी ट्रेन के नीचे आने से टुकड़ों में कट गया हो। ऐसे मामले में, जब यह दिखाने के लिए कोई सबूत नहीं है कि मृतक की मृत्यु कैसे हुई और कोई चश्मदीद गवाह नहीं है, तो समाज कल्याण कानून की व्याख्या करते हुए ट्रेसपासिंग के दावे को खारिज किया जाना चाहिए।”
हाईकोर्ट ने सरकारी रिकॉर्ड्स की खामियों पर भी ध्यान दिया:
- स्टेशन मास्टर की रिपोर्ट: शुरुआत में घटना का कारण “अज्ञात” बताया गया था और ट्रेसपासिंग का कोई जिक्र नहीं था।
- इन्क्वेस्ट पंचनामा: पंचों को मृत्यु के सही कारण की जानकारी नहीं थी।
- परिचालन साक्ष्य: हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी ट्रेन ने ट्रैक पार करने वाले व्यक्ति को टक्कर मारी होती, तो मोटरमैन या गार्ड ने अगले स्टेशन मास्टर को इसकी सूचना दी होती, जो इस मामले में नहीं हुआ।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के निष्कर्ष को उलटते हुए फैसला सुनाया कि यह मृत्यु एक “अप्रिय घटना” थी।
हाईकोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश दिए:
- “ट्रेसपासिंग” के निष्कर्ष को रद्द किया जाता है और इस घटना को “अप्रिय घटना” के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
- पश्चिमी रेलवे अपीलकर्ताओं को 4,00,000 रुपये का मुआवजा और दुर्घटना की तारीख से भुगतान की तारीख तक 6% वार्षिक ब्याज प्रदान करे।
- रेलवे को यह राशि अपीलकर्ताओं द्वारा बैंक विवरण प्रस्तुत करने के 12 सप्ताह के भीतर प्रेषित करनी होगी।
केस विवरण:
- केस का नाम: श्रीमती कोरिना वेलेंटीना डिसूजा और अन्य बनाम भारत संघ
- केस नंबर: फर्स्ट अपील नंबर 1232 ऑफ 2014
- बेंच: जस्टिस जितेंद्र जैन
- फैसले की तारीख: 18 मार्च, 2026

