दिल्ली हाईकोर्ट ने 16 वर्षीय किशोरी के अपहरण और बलात्कार के आरोपी व्यक्ति की दोषमुक्ति (Acquittal) के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण’ (POCSO) अधिनियम के तहत किसी को दोषी ठहराने के लिए पीड़िता की उम्र का “प्रामाणिक” दस्तावेजी प्रमाण अनिवार्य है। जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर ड्यूडेजा की बेंच ने कहा कि जन्मपत्री और टीकाकरण कार्ड को जन्म तिथि का कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता।
अदालत ने रेखांकित किया कि पॉक्सो अधिनियम के तहत मामलों में पीड़िता की आयु “मुख्य प्रश्न” होती है। मूल जन्म प्रमाण पत्र या किसी वैधानिक प्रमाण के अभाव में, पॉक्सो अधिनियम के कठोर प्रावधान लागू नहीं किए जा सकते।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, जनवरी 2013 में आरोपी ने एक किशोरी का अपहरण किया था, जिसकी उम्र उस समय लगभग 16 वर्ष बताई गई थी। किशोरी के घर फोन करने के बाद उसे अमृतसर से बरामद किया गया था। पुलिस ने आरोपी को अमृतसर रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर उस पर भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत अपहरण और बलात्कार, तथा पॉक्सो अधिनियम के तहत पैठ यौन हमले (Penetrative Sexual Assault) का मामला दर्ज किया था।
आरोपी ने ट्रायल के दौरान खुद को बेगुनाह बताते हुए कहा कि उसे झूठा फंसाया गया है। जुलाई 2019 में ट्रायल कोर्ट ने उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
अभियोजन पक्ष के मामले का मुख्य आधार किशोरी की उम्र थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि उसकी नाबालिग होने की पुष्टि करने वाले दस्तावेज कानूनी रूप से पर्याप्त नहीं थे। किशोरी के माता-पिता न तो उसकी सटीक जन्म तिथि बता सके और न ही रिकॉर्ड पर मूल जन्म प्रमाण पत्र पेश कर सके।
लड़की के पिता ने गवाही दी कि स्कूल में दाखिले के लिए उन्होंने जन्मपत्री का उपयोग किया था। कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा:
“यह माना गया है कि जन्मपत्री को जन्म तिथि के प्रमाण के रूप में नहीं माना जा सकता। इसलिए, जन्मपत्री के आधार पर स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज की गई उम्र को भी आयु का प्रमाण नहीं माना जा सकता।”
बेंच ने आगे स्पष्ट किया कि ‘च्चा बच्चा रक्षा कार्ड’ (टीकाकरण कार्ड) में दर्ज जन्म तिथि भी अदालत में उम्र साबित करने के लिए कोई “प्रामाणिक” दस्तावेज नहीं है।
उम्र के मुद्दे के अलावा, हाईकोर्ट ने पीड़िता की गवाही में भी गंभीर खामियां पाईं। बेंच ने टिप्पणी की कि उसके बयान उस “स्टर्लिंग क्वालिटी” (उच्चतम श्रेणी) के नहीं थे, जिसके आधार पर सजा सुनाई जा सके।
कोर्ट ने पाया कि घर छोड़ने की परिस्थितियों, आरोपी के साथ उसके पूर्व संपर्क और कथित अपराध की घटनाओं को लेकर उसकी गवाही में “भौतिक विरोधाभास और विसंगतियां” थीं। इसके अलावा, बेंच ने आरोपी की गिरफ्तारी के स्थान और तरीके पर भी संदेह जताया।
यह निष्कर्ष निकालते हुए कि अभियोजन पक्ष आरोपी के दोष को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है, हाईकोर्ट ने उसकी रिहाई के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया।
बेंच ने बुधवार को दिए अपने फैसले में कहा, “अभियोजन पक्ष प्रतिवादी के दोष को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों में ऐसी कोई अवैधता नहीं है जिसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।”

