बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्देश: लंबी दूरी की ट्रेनों में भी ‘वंदे भारत’ की तर्ज पर हो स्टेशनों की घोषणा, ताकि हादसों पर लगे लगाम

यात्री सुरक्षा को मजबूत करने और रेलवे परिचालन को आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, बॉम्बे हाईकोर्ट ने रेलवे अधिकारियों को सभी लंबी दूरी की ट्रेनों में सार्वजनिक घोषणा प्रणाली (PA System) लागू करने का सुझाव दिया है। कोर्ट ने कहा है कि वंदे भारत एक्सप्रेस की तरह ही अन्य ट्रेनों में भी आने वाले स्टेशनों और जहां ट्रेन नहीं रुकती, उन स्टेशनों के बारे में यात्रियों को स्पष्ट रूप से सूचित किया जाना चाहिए।

यह सुझाव जस्टिस जितेंद्र जैन की एकल पीठ ने रोहिदास कुमावत नामक एक यात्री द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए दिया। कुमावत लगभग एक दशक पहले जलगांव स्टेशन पर चलती ट्रेन से उतरने की कोशिश में घायल हो गए थे।

हाईकोर्ट ने स्थानीय (लोकल) और लंबी दूरी की यात्रा के लिए दी जाने वाली सूचनाओं के बीच अंतर को रेखांकित किया। कोर्ट ने कहा कि जहां लोकल ट्रेनों में डिस्प्ले बोर्ड या घोषणाओं के जरिए यात्रियों को उन स्टेशनों की जानकारी दी जाती है जहां ट्रेन नहीं रुकती, वहीं लंबी दूरी की ट्रेनों के मामले में प्लेटफॉर्म पर ऐसी व्यवस्था अक्सर गायब रहती है।

हाईकोर्ट ने कहा, “लंबी दूरी की ट्रेनों में प्लेटफॉर्म पर ऐसा कोई डिस्प्ले बोर्ड या घोषणा नहीं पाई जाती है। लंबी दूरी की ट्रेनों का उपयोग यात्री एक रेलवे स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक कम दूरी की यात्रा के लिए भी करते हैं।”

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जब इस बारे में कोई घोषणा नहीं की जाती कि ट्रेन किन स्टेशनों पर नहीं रुकेगी, तो उस यात्री को पूरी तरह से दोषी नहीं ठहराया जा सकता जो अपने गंतव्य पर उतरने या चढ़ने की कोशिश करता है, भले ही वहां ट्रेन का ठहराव न हो।

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यह मामला उस समय का है जब रोहिदास कुमावत गुवाहाटी एक्सप्रेस से मनमाड से जलगांव जा रहे थे। यह मानकर कि ट्रेन महाराष्ट्र के एक महत्वपूर्ण स्टेशन जलगांव पर रुकेगी, कुमावत उतरने के लिए तैयार हुए। जब उन्हें अहसास हुआ कि ट्रेन नहीं रुक रही है, तो चलती ट्रेन से उनका संतुलन बिगड़ गया और वह गिर गए, जिससे उनके सिर और पैरों में गंभीर चोटें आईं।

जनवरी 2018 में, रेलवे दावा न्यायाधिकरण (RCT) ने उनके मुआवजे के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह एक “स्व-पहुंचाई गई चोट” (self-inflicted injury) का मामला है। ट्रिब्यूनल का तर्क था कि कुमावत कोच के दरवाजे के पास बैठे थे और उन्होंने जानबूझकर चलती ट्रेन से उतरने का जोखिम उठाया।

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जस्टिस जितेंद्र जैन ने ट्रिब्यूनल के आकलन से असहमति जताई। हाईकोर्ट ने माना कि कुमावत एक वैध यात्री थे और उन्होंने खुद को नुकसान पहुँचाने के इरादे से नहीं, बल्कि घबराहट (Panic) में ऐसा कदम उठाया था।

कोर्ट ने टिप्पणी की, “यह महसूस करने पर कि ट्रेन जलगांव में नहीं रुकी है, अगर कोई व्यक्ति चलती ट्रेन से उतरने का प्रयास करता है, तो स्वाभाविक है कि कुछ चोट आएगी।”

बेंच ने आगे यात्री की मानसिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा, “आवेदक अगले स्टेशन तक प्रतीक्षा कर सकता था, लेकिन उस समय पर एक इंसान अपना मानसिक संतुलन खो देता है और घबराहट में, बिना किसी आत्म-क्षति के इरादे के, उतरने का प्रयास करता है।”

मुआवजा मंजूर करते हुए हाईकोर्ट ने आम जनता को भी कड़ी चेतावनी दी। जस्टिस जैन ने यात्रियों को सलाह दी कि वे स्टेशन छूट जाने या जुर्माना भरने की असुविधा के बजाय अपने जीवन को प्राथमिकता दें।

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जस्टिस जैन ने कहा, “मैं सचेत हूं कि उस समय एक व्यक्ति अपने जीवन को जोखिम में डालने वाले कदम उठा सकता है, लेकिन वही वह समय होता है जब मानसिक संतुलन की परीक्षा होती है। यात्रियों के परिवार के सदस्यों के व्यापक हित में यह आवश्यक है।”

कोर्ट ने रेलवे अधिकारियों को कुमावत को 12 सप्ताह के भीतर 80,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।

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