‘ऋषिपाल सिंह’ मामले के दिशा-निर्देश तब तक लागू नहीं, जब तक राज्य सरकार उन्हें अपना न ले: हाईकोर्ट

हाईकोर्ट की इलाहाबाद लखनऊ खंडपीठ ने ग्राम सभा की भूमि से बेदखली की कार्यवाही को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऋषिपाल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में निर्धारित प्रक्रियात्मक दिशा-निर्देश तब तक अनिवार्य नहीं हैं, जब तक कि राज्य सरकार उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता नियमावली में संशोधन के माध्यम से उन्हें औपचारिक रूप से अपना नहीं लेती।

शहबान और एक अन्य द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति आलोक माथुर की एकल पीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता नियमावली के नियम 66 और 67 के तहत निर्धारित मौजूदा सारांश प्रक्रिया (summary procedure) ही ऐसी कार्यवाहियों के लिए वैध कानूनी ढांचा बनी रहेगी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद लखनऊ की तहसील बख्शी-का-तालाब के ग्राम अस्ती में स्थित गाटा संख्या 648 (क्षेत्रफल 0.300 हेक्टेयर) से संबंधित है। राजस्व अभिलेखों में यह भूमि “खलिहान” के रूप में दर्ज है, जो इसे ग्राम सभा की संपत्ति बनाती है। याचिकाकर्ताओं के खिलाफ उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 67 के तहत इस भूमि पर कथित रूप से अतिक्रमण करने और मस्जिद बनाने के लिए कार्यवाही शुरू की गई थी।

आर.सी. फॉर्म 19 में एक नोटिस जारी किया गया था, जिस पर याचिकाकर्ताओं ने 11 दिसंबर, 2024 को अपनी आपत्तियां दर्ज कीं। उन्होंने तर्क दिया कि उन्होंने मस्जिद का निर्माण नहीं किया है और यह ढांचा 60 वर्षों से अस्तित्व में है। हालांकि, तहसीलदार ने इन आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा कि भूमि ग्राम सभा की है और याचिकाकर्ताओं का इस पर कोई अधिकार नहीं है। परिणामस्वरूप, 28 फरवरी, 2025 को बेदखली का आदेश और 36,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। इस आदेश को बाद में 31 अक्टूबर, 2025 को अपर जिला मजिस्ट्रेट (न्यायिक), लखनऊ ने बरकरार रखा।

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पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ताओं के वकील श्री मोहम्मद मंसूर ने तर्क दिया कि तहसीलदार ने ऋषिपाल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (Writ-C No. 6658 of 2022) के मामले में हाईकोर्ट द्वारा स्थापित प्रक्रिया का उल्लंघन किया है। उन्होंने दलील दी कि उस निर्णय के पैराग्राफ 74 और 75 के अनुसार, अधिकारियों के लिए लेखपाल का बयान दर्ज करना और याचिकाकर्ताओं को गवाहों से जिरह (cross-examination) करने की अनुमति देना अनिवार्य था। यह तर्क दिया गया कि मौखिक साक्ष्य के बिना कार्यवाही का सारांश निष्कर्ष आदेशों को रद्द करने योग्य बनाता है।

इसके विपरीत, राज्य के स्थायी अधिवक्ता ने तर्क दिया कि धारा 67 के तहत कार्यवाही संहिता की धारा 225-ए के अनुसार वैधानिक सारांश प्रक्रिया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऋषिपाल सिंह के फैसले में केवल “दिशा-निर्देश” प्रस्तावित किए गए थे जिन्हें राज्य द्वारा “अपनाया” जाना था। चूंकि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता नियमावली में इन दिशा-निर्देशों को शामिल करने के लिए अभी तक संशोधन नहीं किया गया है, इसलिए मौजूदा सारांश नियम ही प्रभावी रहेंगे।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 67 और नियम 66 व 67 के तहत वैधानिक योजना का परीक्षण किया। हाईकोर्ट ने गौर किया कि धारा 225-ए विशेष रूप से प्रावधान करती है कि सारांश कार्यवाही का निर्णय शपथ पत्रों के आधार पर किया जाएगा, और जिरह राजस्व अधिकारी के विवेक पर निर्भर करती है यदि वह इसे आवश्यक समझे।

ऋषिपाल सिंह के फैसले के प्रभाव के संबंध में, हाईकोर्ट ने कहा:

“मुद्दा यह है कि क्या ऋषिपाल (पूर्ववत) के पैराग्राफ 74 के खंड (vi) के उल्लंघन में जारी किसी भी आदेश को राज्य सरकार द्वारा उचित नियमों में संशोधन किए बिना रद्द किया जा सकता है?”

हाईकोर्ट ने इस स्थिति को ऐतिहासिक विशाखा मामले से अलग बताते हुए कहा कि वर्तमान मामले में कोई विधायी शून्यता (legislative vacuum) नहीं है क्योंकि विशिष्ट, वैध और लागू नियम पहले से ही मौजूद हैं।

पीठ ने आगे कहा:

“एक बार जब हाईकोर्ट ने स्वयं उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा उक्त दिशा-निर्देशों/नियमों को ‘अपनाने’ के निर्देश जारी किए हैं, तो ऐसा अपनाना आवश्यक है, और इसे अपनाए बिना, इस हाईकोर्ट द्वारा तैयार किए गए दिशा-निर्देशों को लागू नहीं किया जा सकता है।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऋषिपाल सिंह के दिशा-निर्देशों को अपनाने से सारांश प्रक्रिया प्रभावी रूप से एक नियमित प्रक्रिया में बदल जाएगी, जिसमें मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर देना होगा, जो कि राज्य द्वारा औपचारिक रूप से अपनाए जाने से पहले दिशा-निर्देशों का उद्देश्य नहीं था।

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निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि उत्तर प्रदेश सरकार ने नियम 66 और 67 के तहत निर्धारित मौजूदा प्रक्रिया का पालन किया है। चूंकि याचिकाकर्ता “खलिहान” की भूमि पर कोई अधिकार या मालिकाना हक साबित करने में विफल रहे, इसलिए बेदखली का आदेश वैध माना गया।

हालांकि, जुर्माने के संबंध में हाईकोर्ट ने आंशिक राहत प्रदान की:

“जुर्माना लगाने के संबंध में, इस हाईकोर्ट का मानना है कि याचिकाकर्ताओं को मस्जिद के निर्माण या कब्जे से जोड़ने वाली कोई सामग्री नहीं थी, इसलिए इसे बरकरार नहीं रखा जा सकता है और तदनुसार इसे रद्द किया जाता है।”

इन टिप्पणियों के साथ, रिट याचिका को खारिज कर दिया गया और बेदखली के आदेशों की वैधता की पुष्टि की गई।

केस विवरण:

  • केस का नाम: शहबान और एक अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, अपर मुख्य सचिव राजस्व व अन्य के माध्यम से
  • केस संख्या: WRIT-C No. 704 of 2026
  • पीठ: न्यायमूर्ति आलोक माथुर
  • याचिकाकर्ता के वकील: अब्दुल हलीम, आशिक अली, मोहम्मद दानिश, मोहम्मद काशिफ, मोहम्मद मंसूर, मोहम्मद शमीम खान
  • प्रतिवादी के वकील: सी.एस.सी. (C.S.C.), दिलीप कुमार पांडे, योगेश कुमार अवस्थी (स्थायी अधिवक्ता)
  • तारीख: 25 मार्च, 2026

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