सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि एक बार जब सुप्रीम कोर्ट सहित उच्च अदालतों द्वारा निष्कासन (eviction) आदेश की पुष्टि कर दी जाती है, तो रेंट अथॉरिटी के पास उस आदेश को वापस लेने या बदलने का कोई अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) नहीं रह जाता। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सहारनपुर के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (प्रशासन) द्वारा पारित बहाली (restoration) के आदेश को “शून्य” (void) घोषित करते हुए कहा कि अधिकार क्षेत्र के बिना पारित आदेश की कानून की नजर में कोई अहमियत नहीं है।
पीठ ने किरायेदार द्वारा सभी कानूनी स्तरों पर विफल होने के बाद मामले को फिर से शुरू करने के प्रयास को “कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग और इस न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन” करार दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में स्थित एक संपत्ति के किरायेदारी से जुड़ा है। ‘यू.पी. अर्बन प्रिमाइसेस रेंट कंट्रोल ऑर्डिनेंस, 2021’ की धारा 21(2) के तहत कार्यवाही शुरू की गई थी। सितंबर 2022 में, रेंट अथॉरिटी ने मकान मालिक और किरायेदार के संबंधों की पुष्टि करते हुए किरायेदार राजेश गोयल को परिसर खाली करने का निर्देश दिया था।
इस आदेश को जिला जज, सहारनपुर और बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरकरार रखा। इसके बाद किरायेदार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की, जिसे 20 सितंबर, 2024 को खारिज कर दिया गया। न्यायालय ने किरायेदार को 31 मार्च, 2025 तक परिसर खाली करने का समय दिया था। इसके बावजूद, किरायेदार ने रेंट अथॉरिटी के समक्ष बहाली आवेदन दायर किया, जिसे 15 मई, 2025 को रेंट अथॉरिटी ने स्वीकार कर लिया।
अधिकार क्षेत्र का मुद्दा और हितों का टकराव
सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि रेंट अथॉरिटी (एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट) ने “स्वामित्व/टाइटल” के आधार पर बहाली आवेदन पर विचार किया, जबकि ‘यू.पी. अर्बन प्रिमाइसेस रेंट कंट्रोल एक्ट, 2021’ की धारा 38(2) स्पष्ट रूप से कहती है कि रेंट अथॉरिटी का अधिकार क्षेत्र “परिसर के स्वामित्व या टाइटल के प्रश्न तक विस्तारित नहीं होगा।”
पीठ ने हितों के टकराव (conflict of interest) का भी उल्लेख किया। न्यायालय ने पाया कि जिस अधिकारी ने रेंट अथॉरिटी के रूप में कार्य किया, उन्होंने ही एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट की अपनी क्षमता में एक जांच रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें मकान मालिक के सेल डीड को जाली बताया गया था। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट होने के नाते उन्हें सौंपी गई जांच उनके रेंट अथॉरिटी के रूप में शक्ति का प्रयोग करने पर हावी हो गई। हमारे विचार में, यह अस्वीकार्य है क्योंकि रेंट अथॉरिटी एक विशिष्ट कानून (special statute) के तहत काम करती है जिसके कार्य क्षेत्र स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं।”
न्यायिक अनुशासन पर कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक शिष्टाचार (judicial comity) और अदालतों के पदानुक्रम का पालन कानून के शासन के लिए आवश्यक है। कोर्ट ने कहा कि मकान मालिक-किरायेदार का रिश्ता “न्यायिक समीक्षा के सभी स्तरों पर निर्णायक रूप से स्थापित” हो चुका था और इसे किसी अधीनस्थ अधिकारी द्वारा चुनौती नहीं दी जा सकती थी।
पीठ ने न्यायिक अनुशासन के महत्व को रेखांकित करने के लिए कई मिसालों का हवाला दिया:
- उच्च न्यायालयों की अवज्ञा पर (बरादकांत मिश्रा बनाम भीमसेन दीक्षित): न्यायालय ने उल्लेख किया कि “पिछले फैसले में दिए गए कानून का पालन न करने का जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण आचरण हाईकोर्ट के संवैधानिक अधिकार और सम्मान को कमजोर करता है” और यह “कानून के शासन को नष्ट करने जैसा है।”
- न्यायिक अखंडता पर (सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम जस्टिस ए.एम. भट्टाचार्जी): “न्यायिक कार्यालय अनिवार्य रूप से एक सार्वजनिक विश्वास (public trust) है… कोई भी आचरण जो न्यायालय की अखंडता और निष्पक्षता में जनता के विश्वास को कम करता है, वह न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावकारिता के लिए हानिकारक होगा।”
- मिसाल की बाध्यता पर (एम.ए. मूर्ति बनाम कर्नाटक राज्य): “नजीर (binding precedent) का सिद्धांत न्यायिक निर्णयों में निश्चितता और निरंतरता को बढ़ावा देने में मदद करता है।”
निर्णय और अंतिम आदेश
15 मई, 2025 के बहाली आदेश को शून्य घोषित करते हुए न्यायालय ने कहा:
“यह स्थिति कि अधिकार क्षेत्र के बिना पारित आदेश शून्य है, किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं रखती और इस प्रकार, रेंट अथॉरिटी का आदेश, जो 15 मई 2025 का है, शून्य घोषित किया जाता है।”
हालांकि कोर्ट ने संबंधित अधिकारी को अवमानना का कारण बताओ नोटिस जारी किया था, लेकिन अधिकारी द्वारा बिना शर्त माफी मांगे जाने के बाद कोर्ट ने उसे स्वीकार कर लिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इन कार्यवाहियों का न्यायिक अधिकारी के करियर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि, कोर्ट ने कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग के लिए किरायेदार पर ₹5 लाख का जुर्माना लगाया, जिसे ‘सुप्रीम कोर्ट मिडिल इनकम ग्रुप लीगल एड सोसाइटी’ में जमा करने का निर्देश दिया गया है।
मामले का विवरण:
- केस का नाम: राजेश गोयल बनाम मेसर्स लक्ष्मी कंस्ट्रक्शंस एवं अन्य
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या ___/2026 (@ SLP (सिविल) संख्या 27184/2025)
- पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह
- तारीख: 25 मार्च, 2026

