पवन ऊर्जा परियोजनाओं के लिए GBI निर्धारित टैरिफ से अलग और अतिरिक्त है; सुप्रीम कोर्ट ने डिस्कॉम की अपील खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि भले ही राज्य विद्युत नियामक आयोगों (SERCs) के पास बिजली की दरें (टैरिफ) निर्धारित करने की पूर्ण शक्ति है, लेकिन वे नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) द्वारा दी जाने वाली ‘जनरेशन बेस्ड इंसेंटिव’ (GBI) को आधार बनाकर टैरिफ कम नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि GBI एक ‘जेनरेटर-केंद्रित’ प्रोत्साहन है जिसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण नीतियों को बढ़ावा देने के लिए डिज़ाइन किया गया है, और इसे पवन ऊर्जा उत्पादकों को स्वीकृत टैरिफ के अलावा और उससे ऊपर दिया जाना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद आंध्र प्रदेश की सदर्न पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी (डिस्कॉम) और विभिन्न पवन ऊर्जा उत्पादक कंपनियों (जेनकोस) के बीच शुरू हुआ था। साल 2009 में, MNRE ने एक GBI योजना शुरू की थी, जिसके तहत ग्रिड को बिजली देने वाले पवन ऊर्जा उत्पादकों को 0.50 रुपये प्रति यूनिट का प्रोत्साहन दिया जाता था। इस योजना में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि यह प्रोत्साहन राज्य नियामक आयोगों द्वारा अनुमोदित टैरिफ के “अतिरिक्त” होगा।

2015 में, आंध्र प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (APERC) ने टैरिफ विनियम अधिसूचित किए, जिसमें विनियम 20 (Regulation 20) के तहत आयोग को टैरिफ तय करते समय केंद्र या राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली किसी भी सब्सिडी या प्रोत्साहन पर “विचार” करने की शक्ति दी गई थी। शुरुआत में, आयोग ने GBI को घटाए बिना टैरिफ आदेश जारी किए, लेकिन 2018 में डिस्कॉम की याचिका पर आयोग ने जेनकोस को किए जाने वाले भुगतान से GBI की राशि काटने की अनुमति दे दी।

इस आदेश को विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण (APTEL) में चुनौती दी गई, जिसने 19 दिसंबर, 2024 को APERC के फैसले को रद्द कर दिया। इसके बाद डिस्कॉम ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

READ ALSO  तमिलनाडु सरकार-राज्यपाल के बीच विधेयक को मंजूरी देने के विवाद में सुप्रीम कोर्ट प्रमुख सवालों पर विचार करेगा

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता डिस्कॉम की दलील थी कि टैरिफ तय करना नियामक आयोगों का “विशिष्ट अधिकार” है और विनियम 20 के तहत सब्सिडी को ध्यान में रखना अनिवार्य है। उन्होंने तर्क दिया कि GBI जैसी प्रशासनिक योजना आयोग की वैधानिक शक्तियों को कम नहीं कर सकती।

दूसरी ओर, पवन ऊर्जा कंपनियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदंबरम ने दलील दी कि GBI संविधान के अनुच्छेद 282 के तहत एक संसदीय अनुदान है। उन्होंने कहा कि चूंकि संसद ने इसे जेनरेटरों को प्रोत्साहित करने के सार्वजनिक उद्देश्य के लिए आवंटित किया है, इसलिए नियामक आयोग इसे टैरिफ कम करके “उपभोक्ता प्रोत्साहन” में बदलकर संसद के इरादे को विफल नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ऐसा करना अनुच्छेद 114(2) का उल्लंघन होगा।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने नियामक आयोगों की शक्तियों और सीमाओं का विश्लेषण किया।

READ ALSO  दिल्ली हाईकोर्ट: अपराधी बच्चों को बना रहे हैं ‘हथियार’, तस्करी और अवैध शराब बिक्री के मामले में महिला को अग्रिम जमानत देने से इनकार

I. नियामक शक्ति का दायरा कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि नियामक आयोगों को केंद्र सरकार के अनुदानों पर विचार करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा:

“विद्युत नियामक आयोगों के पास टैरिफ निर्धारण की पूर्ण शक्ति है और उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर ऐसा कोई नियामक हिस्सा नहीं बचता है… टैरिफ निर्धारण पूरी तरह से नियामक आयोगों का ही प्रांत है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 114(2) के तहत अनुदान के गंतव्य (destination) को बदलने पर रोक है, लेकिन चूंकि GBI सीधे जेनकोस को मिलता है, इसलिए टैरिफ तय करने की प्रक्रिया से इस भुगतान के रास्ते में कोई हस्तक्षेप नहीं होता।

II. टैरिफ निर्धारण में कर्तव्य और दायित्व हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि नियामक शक्ति का उपयोग एक “सहयोगी उद्यम” (collaborative enterprise) के रूप में किया जाना चाहिए। कोर्ट ने पेरिस समझौते के तहत भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं और 2030 तक 450 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता हासिल करने के राष्ट्रीय लक्ष्य का हवाला दिया।

विनियम 20 के संदर्भ में कोर्ट ने कहा कि किसी प्रोत्साहन पर “विचार करने” का मतलब उसकी अनिवार्य कटौती नहीं है। पीठ ने टिप्पणी की:

“यदि कोई योजना ‘उपभोक्ता सब्सिडी’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘जेनरेटर-केंद्रित प्रोत्साहन’ के रूप में बनाई गई थी और वह राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय नीतियों को साकार करने से जुड़ी है, तो आयोग को उसका सम्मान करना चाहिए और उसे प्रभावी बनाना चाहिए।”

READ ALSO  कोर्ट की सुनवाई के दौरान रो पड़ी हनी सिंह की पत्नी, कहा 10 वर्ष साथ रहने के बावजूद अकेला छोड़ा

कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने डिस्कॉम द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया और APTEL के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि APERC को GBI को उसी उद्देश्य के लिए लागू करना चाहिए था जिसके लिए इसे बनाया गया था—यानी पवन ऊर्जा उत्पादकों को प्रोत्साहित करना।

कोर्ट ने दो प्रमुख सिद्धांतों को दोहराया:

  1. नियामक आयोगों के पास टैरिफ तय करने की पूर्ण शक्ति है, जिसमें केंद्रीय अनुदानों पर विचार करना भी शामिल है।
  2. लेकिन इस शक्ति का प्रयोग इस तरह नहीं किया जाना चाहिए जो अन्य हितधारकों की नीति या अनुदान के उद्देश्य को ही नजरअंदाज कर दे।

कोर्ट ने फैसला सुनाया कि GBI पवन ऊर्जा क्षेत्र के प्रोत्साहन को सुरक्षित रखते हुए जेनकोस को “टैरिफ के अतिरिक्त” दी जाने वाली राशि है।

मामले का विवरण:

  • केस का शीर्षक: सदर्न पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ऑफ आंध्र प्रदेश लिमिटेड व अन्य बनाम ग्रीन इंफ्रा विंड सॉल्यूशंस लिमिटेड व अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 4495, 2025
  • पीठ: जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर
  • दिनांक: 25 मार्च, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles