सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण के एक महत्वपूर्ण मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि नागरिकों को मिलने वाले “उचित मुआवजे” की संवैधानिक गारंटी को राज्य पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ के आधार पर कम या कमजोर नहीं किया जा सकता है।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस उज्जल भुयन की बेंच ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की पुनर्विचार याचिका का निपटारा करते हुए यह बात कही। NHAI ने शीर्ष अदालत के 4 फरवरी, 2025 के उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की थी, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि NHAI अधिनियम के तहत अधिग्रहित भूमि के लिए किसानों को ब्याज और सोलेशियम (परितोष) देने का 2019 का निर्णय पिछली तारीख से (रिट्रोस्पेक्टिव) लागू होगा।
पूरा विवाद इस बात पर केंद्रित है कि क्या NHAI अधिनियम के तहत अधिग्रहित भूमि के मालिक भी उसी सोलेशियम और ब्याज के हकदार हैं, जो सामान्य भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत मिलता है।
2019 में, सुप्रीम कोर्ट ने NHAI अधिनियम की धारा 3J को असंवैधानिक करार दिया था क्योंकि यह भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की लागू करने की शक्ति को रोकती थी। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन माना था। इसके परिणामस्वरूप, भू-स्वामियों को NHAI अधिनियम की 5% की सीमा के बजाय भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अनुसार 9% ब्याज पाने का पात्र माना गया।
NHAI ने कोर्ट में दलील दी कि इस फैसले को पिछली तारीख से लागू करने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा। शुरुआत में यह देनदारी लगभग ₹100 करोड़ आंकी गई थी, लेकिन NHAI ने बेंच को बताया कि संशोधित अनुमान के अनुसार यह राशि लगभग ₹29,000 करोड़ (कुछ अनुमानों में ₹32,000 करोड़) तक पहुँच सकती है।
भारी लागत के आधार पर कानून को बदलने की दलील को खारिज करते हुए चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने कहा:
“सोलेशियम और ब्याज का भुगतान वित्तीय बोझ की मात्रा पर निर्भर नहीं हो सकता। इसके आधार पर उचित मुआवजे की संवैधानिक गारंटी को कम नहीं किया जा सकता है। केवल वित्तीय देनदारी का अनुमान पुनर्विचार का वैध आधार नहीं है।”
मुआवजे के अधिकार को बरकरार रखते हुए, बेंच ने मुकदमों के अंतहीन चक्र को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया। कोर्ट ने कहा कि सभी दावे एक समान नहीं होते और “कानूनी निश्चितता” (Certainty in litigation) की आवश्यकता पर जोर दिया।
बेंच ने स्पष्ट किया कि यद्यपि कानून भू-स्वामियों को इन लाभों का हकदार बनाता है, लेकिन वे उन “तयशुदा दावों” (Concluded Claims) को फिर से नहीं खोल सकते जो पिछले अदालती आदेशों या मध्यस्थता पुरस्कारों (Arbitral Awards) के माध्यम से अंतिम रूप प्राप्त कर चुके हैं।
कोर्ट ने टिप्पणी की, “भू-स्वामियों के अधिकारों और मुकदमों में निश्चितता की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाए रखा जाना चाहिए। पहले से सुलझ चुके मामलों को अंतहीन रूप से दोबारा खोलने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
कोर्ट ने 23 फरवरी को की गई टिप्पणियों को दोहराते हुए स्पष्ट किया:
- मार्च 2018 से पहले के मामले: यदि वे पहले ही सुलझाए जा चुके हैं, तो उन्हें सामान्यतः दोबारा नहीं खोला जा सकता।
- लंबित दावे: जो मामले 2008 (कट-ऑफ तिथि) तक लंबित थे, वे समानता के आधार पर लाभ पाने के पात्र बने रहेंगे।
- ब्याज बनाम सोलेशियम: कोर्ट ने संकेत दिया कि 2008 के मामलों के आधार पर हाल ही में समानता की मांग करने वाले पुराने आवेदनों में सोलेशियम दिया जा सकता है, लेकिन ब्याज के मामले में वही नियम लागू नहीं हो सकते।
NHAI की आर्थिक बोझ वाली दलील को खारिज कर सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भूमि अधिग्रहण के मामलों में अनुच्छेद 14 के तहत समानता का सिद्धांत और मौलिक अधिकार, सरकारी खजाने की बजटीय सीमाओं से ऊपर हैं।

