दिल्ली ट्रिब्यूनल का बड़ा फैसला: ‘हिट-एंड-ड्रैग’ मामले में पैर गंवाने वाले डिलीवरी पार्टनर को ₹1.36 करोड़ का मुआवजा

दिल्ली मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने 2024 में एक ‘हिट-एंड-ड्रैग’ सड़क दुर्घटना में अपना पैर गंवाने वाले 21 वर्षीय युवक को ₹1.36 करोड़ से अधिक का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि दुर्घटना के बाद पीड़ित को घसीटा जाना ही ड्राइवर की लापरवाही और लापरवाही भरे व्यवहार को दर्शाने के लिए पर्याप्त है।

प्रिसाइडिंग ऑफिसर पूजा अग्रवाल ने 23 मार्च को दिए अपने फैसले में याचिकाकर्ता एहतेशाम के जीवन पर पड़ने वाले दीर्घकालिक शारीरिक और आर्थिक प्रभाव को रेखांकित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़ित को जीवन भर कृत्रिम अंग (प्रोस्थेटिक लिम्ब) की आवश्यकता होगी।

यह मामला 14 सितंबर 2024 का है, जब एहतेशाम दिल्ली के मजनू का टीला इलाके के पास अपनी मोटरसाइकिल से जा रहे थे। तभी एक तेज रफ्तार ट्रक ने पीछे से उनकी बाइक को टक्कर मार दी। टक्कर इतनी जोरदार थी कि एहतेशाम नीचे गिर गए और ट्रक उन्हें लगभग तीन से चार फीट तक घसीटता हुआ ले गया।

हादसे के बाद उन्हें पहले सिविल लाइंस के ट्रॉमा सेंटर और फिर लोक नायक अस्पताल ले जाया गया। एक महीने तक चले इलाज और सर्जरी के बाद उनका बायां पैर काटना पड़ा। मेडिकल बोर्ड ने उन्हें 80 प्रतिशत कार्यात्मक रूप से विकलांग घोषित किया है और उनकी यह स्थिति स्थायी है, जिसमें सुधार की संभावना नहीं है।

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ट्रिब्यूनल ने पाया कि याचिकाकर्ता की गवाही पूरी तरह स्पष्ट थी और सिविल लाइंस पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 281 और 125 के तहत दर्ज FIR के साथ मेल खाती थी।

अदालत ने अपने फैसले में कहा, “दुर्घटना तब हुई जब याचिकाकर्ता अपनी मोटरसाइकिल चला रहा था और आरोपी वाहन ने उसे टक्कर मारी और रुकने के बजाय उसे 3-4 फीट तक घसीटा। एक चलते हुए वाहन को टक्कर मारना और फिर उसे घसीटना अपने आप में ड्राइवर की ओर से घोर लापरवाही और उतावलेपन का प्रमाण है।”

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ट्रिब्यूनल ने इस बात पर भी गौर किया कि प्रतिवादी ड्राइवर ने अपनी सफाई देने के लिए गवाह के तौर पर पेश होने की जहमत नहीं उठाई, जिसके आधार पर अदालत ने उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला।

कुल ₹1.36 करोड़ के मुआवजे में से ₹77.95 लाख की एक बड़ी राशि भविष्य के चिकित्सा खर्चों के लिए निर्धारित की गई है। पीड़ित ने साबित किया कि एक बार प्रोस्थेटिक अंग बदलवाने की लागत ₹11.13 लाख आती है और इसे हर छह से सात साल में बदलना पड़ता है।

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याचिकाकर्ता की कम उम्र को देखते हुए कोर्ट ने कहा, “यदि औसत जीवनकाल 70 वर्ष भी मान लिया जाए, तो भी याचिकाकर्ता को स्थायी शारीरिक विकलांगता के साथ एक लंबा जीवन जीना है और उसे स्पष्ट रूप से पूरे जीवन के लिए कृत्रिम अंग की आवश्यकता होगी।”

ट्रिब्यूनल ने इस ट्रक का बीमा करने वाली कंपनी यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को मालिक की क्षतिपूर्ति करने का उत्तरदायी ठहराया और 30 दिनों के भीतर मुआवजे की राशि जमा करने का आदेश दिया।

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