इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें लखनऊ के जिला जज के एक आदेश को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिविल कोर्ट के न्यायिक आदेशों को भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत चुनौती नहीं दी जा सकती; इसके लिए अनुच्छेद 227 ही उचित माध्यम है। इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने कहा कि यदि अलग-अलग निष्पादन (Execution) मामलों में आदेश पारित किए गए हैं, तो भले ही वे एक ही साझा फैसले (Common Judgment) के माध्यम से आए हों, उनके खिलाफ अलग-अलग रिट याचिकाएं दायर करना आवश्यक है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 6 अप्रैल 1974 को रूप चंद और प्रतिवादी संख्या 2 व 3 के बीच लखनऊ के फैजुल्लागंज स्थित खसरा नंबर 416 और 417 के आधे हिस्से की बिक्री के दो समझौतों से शुरू हुआ था। ₹30,000 की अग्रिम राशि का भुगतान किया गया था, लेकिन बाद में राज्य सरकार ने इस भूमि को एलडीए (LDA) परियोजना के लिए अधिग्रहित कर लिया।
मामला मध्यस्थता (Arbitration) में गया, जहाँ एक समझौता हुआ: यदि भूमि का अधिग्रहण वापस नहीं लिया गया, तो प्रतिवादियों को ब्याज सहित उनकी अग्रिम राशि वापस मिलेगी; और यदि भूमि मुक्त कर दी गई, तो वे रूप चंद के कानूनी वारिसों को कुल ₹21,00,000 का भुगतान करेंगे। उत्तर प्रदेश नगर योजना एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 17 के तहत भूमि मुक्त होने के बाद, जब वारिसों ने सेल डीड निष्पादित नहीं की, तब प्रतिवादियों ने निष्पादन मामला संख्या 63 और 64 (2011) दायर किया।
18 नवंबर 2013 को जिला जज ने आदेश दिया कि स्टाम्प ड्यूटी 20 दिसंबर 2008 (आर्बिट्रेशन अवार्ड की तारीख) के बाजार मूल्य पर ली जानी चाहिए, न कि वर्तमान तारीख पर। राज्य सरकार ने बाजार मूल्य के इस निर्धारण को चुनौती दी थी।
पक्षों के तर्क
राज्य की ओर से अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता (CSC) ने तर्क दिया कि स्टाम्प ड्यूटी का भुगतान उस बाजार मूल्य पर होना चाहिए जो दस्तावेज़ के पंजीकरण के समय प्रभावी हो। राज्य का कहना था कि जिला जज ने कानून की स्पष्ट गलती की है और चूंकि दोनों मामलों का फैसला एक ही आदेश से हुआ था, इसलिए एक साझा रिट याचिका विचारणीय है।
वहीं, प्रतिवादियों के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सुदीप सेठ ने दो प्रमुख आपत्तियां उठाईं:
- एक ही साझा निर्णय से तय हुए दो निष्पादन मामलों को एक ही रिट याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी जा सकती।
- सिविल कोर्ट के न्यायिक आदेश अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र में नहीं आते और उन्हें केवल अनुच्छेद 227 के तहत ही चुनौती दी जा सकती है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
न्यायमूर्ति इरशाद अली ने याचिका की प्रक्रियात्मक वैधता की जांच की। एक ही याचिका में कई आदेशों को चुनौती देने के संबंध में कोर्ट ने ‘अमित कुमार गुप्ता और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ (स्पेशल अपील नंबर 1, 2020) का संदर्भ देते हुए कहा:
“इस कोर्ट में स्थापित प्रक्रिया यह है कि यदि कई रिट याचिकाएं एक साझा निर्णय द्वारा तय की जाती हैं, तो चुनौती देने के लिए अलग-अलग अपील/याचिकाएं दायर करनी होंगी।”
क्षेत्राधिकार के मुद्दे पर, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘राधे श्याम और अन्य बनाम छबी नाथ और अन्य’ (2015) मामले के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था:
“सिविल कोर्ट के न्यायिक आदेश संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र में नहीं आते हैं। अनुच्छेद 227 के तहत अधिकार क्षेत्र अनुच्छेद 226 से अलग है।”
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि स्टाम्प ड्यूटी पर रिपोर्ट देते समय डिप्टी रजिस्ट्रार ने सुप्रीम कोर्ट के ‘रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन, नोएडा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2009)’ के फैसले की अनदेखी की थी।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिका दो आधारों पर विचारणीय नहीं है: पहला, सिविल कोर्ट के आदेश को चुनौती देने के लिए अनुच्छेद 226 का गलत उपयोग और दूसरा, दो अलग-अलग निष्पादन आदेशों को एक ही याचिका में जोड़ना।
न्यायमूर्ति इरशाद अली ने आदेश दिया:
“यह रिट याचिका इस छूट के साथ खारिज की जाती है कि याचिकाकर्ता निष्पादन केस संख्या 63 और 64 (2011) में पारित आदेशों को चुनौती देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अलग-अलग याचिकाएं दायर कर सकता है।”
केस विवरण:
- केस शीर्षक: उत्तर प्रदेश राज्य बनाम जिला जज लखनऊ व अन्य
- केस संख्या: WRIT-C No. 1001905 of 2014
- बेंच: न्यायमूर्ति इरशाद अली
- निर्णय की तिथि: 23 मार्च, 2026

