दोषमुक्ति के बाद निलंबन अवधि का पूरा वेतन पाने का हकदार है कर्मचारी: मद्रास हाईकोर्ट ने TANGEDCO को निलंबन को ‘ड्यूटी’ मानने का दिया निर्देश

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने तमिलनाडु जनरेशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (TANGEDCO) के उन आदेशों को रद्द कर दिया है, जिसमें एक पूर्व कर्मचारी की निलंबन अवधि को ‘अवकाश’ (leave) के रूप में माना गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रासंगिक सेवा नियमों के तहत, यदि कोई कर्मचारी आपराधिक मामलों से दोषमुक्त हो जाता है, तो वह अपनी निलंबन अवधि को सभी उद्देश्यों के लिए ‘ड्यूटी’ के रूप में मानने और पूर्ण वेतन व भत्ते प्राप्त करने का हकदार है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता पलारमन, TANGEDCO में सहायक कार्यकारी अभियंता के रूप में कार्यरत थे, जब उन्हें 20 अक्टूबर 2010 को निलंबित कर दिया गया था। यह निलंबन भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धाराओं 7, 13(2) r/w 13(1) और 19(1)(c) के तहत दर्ज एक आपराधिक मामले के कारण किया गया था।

निलंबन के दौरान ही याचिकाकर्ता 31 मई 2015 को सेवानिवृत्ति की आयु तक पहुंच गए, लेकिन आपराधिक कार्यवाही लंबित होने के कारण उन्हें सेवानिवृत्त होने की अनुमति नहीं दी गई। 30 जून 2022 को विशेष न्यायाधीश-सह-मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, श्रीविल्लीपुत्तुर ने याचिकाकर्ता को दोषमुक्त कर दिया। इसके बाद, TANGEDCO ने 14 जून 2023 को निलंबन रद्द कर दिया और उन्हें 31 मई 2015 से पूर्वव्यापी प्रभाव (retrospectively) से सेवानिवृत्त होने की अनुमति दी।

विवाद तब शुरू हुआ जब प्रतिवादियों ने 4 दिसंबर 2024 और 30 जनवरी 2025 को आदेश जारी कर याचिकाकर्ता की निलंबन अवधि (20.10.2010 से 31.05.2015) को ड्यूटी के बजाय अर्जित अवकाश (Earned Leave) और बिना वेतन के असाधारण अवकाश (EOL) के रूप में नियमित करने का निर्णय लिया।

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पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील श्री आर. करुणानिधि ने तर्क दिया कि यह मामला TNEB सेवा विनियमों के विनियम 57(A) के रूलिंग 9 के अंतर्गत आता है। उन्होंने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता को सभी आपराधिक आरोपों से बरी कर दिया गया है और बोर्ड ने विभागीय कार्यवाही भी समाप्त कर दी है, इसलिए वह पूर्ण वेतन और भत्तों के हकदार हैं।

दूसरी ओर, TANGEDCO के स्थायी वकील श्री एस. अरिवझगन ने दलील दी कि रूलिंग 9 इस मामले में लागू नहीं होती क्योंकि याचिकाकर्ता दोषमुक्ति से पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके थे, जिसका अर्थ है कि सेवा में कोई वास्तविक “पुनर्बहाली” (reinstatement) नहीं हुई। उन्होंने “नो वर्क, नो पे” के सिद्धांत का भी हवाला दिया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस मुम्मिनैनी सुधीर कुमार ने प्रतिवादियों की तकनीकी आपत्तियों को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि निलंबन आदेश को रद्द करना और पूर्वव्यापी प्रभाव से सेवानिवृत्ति की अनुमति देना “डीम्ड पुनर्बहाली” (deemed reinstatement) के समान है।

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हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“एक बार निलंबन आदेश रद्द हो जाने के बाद, वह डीम्ड पुनर्बहाली के समान है और फिर उसे सेवा से सेवानिवृत्त होने की अनुमति दी जाती है। यदि उक्त आदेश में पुनर्बहाली को शामिल नहीं माना जाता है, तो प्रतिवादी बोर्ड द्वारा याचिकाकर्ता को 31.5.2015 से सेवानिवृत्त होने की अनुमति देने का प्रश्न ही नहीं उठता।”

हाईकोर्ट ने विनियम 57-A के रूलिंग 9 पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया है कि जहाँ किसी कर्मचारी को आपराधिक मुकदमे के कारण निलंबित किया जाता है और बाद में उसे दोषमुक्त कर दिया जाता है, तो उसे “अपनी ड्यूटी करने से रोका गया माना जाना चाहिए और निलंबन अवधि सहित उसकी अनुपस्थिति की अवधि को सभी उद्देश्यों के लिए ड्यूटी के रूप में माना जाएगा।”

हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि प्रतिवादियों ने स्वयं अपने विवादित आदेश में विनियमन 57-A का उल्लेख किया था, ऐसे में बाद में इसकी प्रयोज्यता पर सवाल उठाना विरोधाभासी है। “नो वर्क, नो पे” के सिद्धांत को भी कोर्ट ने सेवा नियमों के आलोक में अप्रासंगिक पाया।

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फैसला

रिट याचिका को स्वीकार करते हुए, हाईकोर्ट ने TANGEDCO के मुख्य अभियंता और अधीक्षण अभियंता द्वारा पारित विवादित आदेशों को रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया:

“यह रिट याचिका स्वीकार की जाती है और प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाता है कि वे 20.10.2010 से 31.05.2015 तक की निलंबन की पूरी अवधि को ड्यूटी अवधि के रूप में मानें और इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से दो महीने के भीतर सभी वेतन और भत्तों का भुगतान करें।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निलंबन अवधि के दौरान याचिकाकर्ता को दिए गए निर्वाह भत्ते (subsistence allowance) को वेतन और भत्तों के अंतिम भुगतान में समायोजित किया जाना चाहिए।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: पलारमन बनाम अध्यक्ष सह प्रबंध निदेशक, TANGEDCO और अन्य
  • केस नंबर: WP(MD). No. 6343 of 2025
  • बेंच: जस्टिस मुम्मिनैनी सुधीर कुमार
  • फैसले की तारीख: 11/03/2026

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