गुजरात हाईकोर्ट ने चेक बाउंस के एक मामले में आरोपी की सजा को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया है कि यदि चेक जारी करने से पहले कुछ राशि का भुगतान कर दिया गया है, तो वह स्वतः ही चेक पर अंकित “कानूनी रूप से लागू ऋण” (legally enforceable debt) को अमान्य नहीं करता। जस्टिस हसमुख डी. सुथार की पीठ ने कहा कि यदि आरोपी यह साबित करने में विफल रहता है कि वह आंशिक भुगतान उसी विशिष्ट चेक के बदले किया गया था, तो एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कानूनी विवाद एमएस यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर (शिकायतकर्ता, शांतिभाई कल्याणजीभाई शाह) और एक चपरासी (आवेदक/आरोपी, राजुभाई कालिदास चुनारा) के बीच का है। शिकायतकर्ता के अनुसार, उन्होंने 2006 से 2010 के बीच आरोपी को कुल 3,50,000 रुपये का हाथ उधार दिया था।
इस ऋण को चुकाने के लिए आरोपी ने यूको बैंक के दो चेक जारी किए: एक 1,50,000 रुपये का (दिनांक 24 जुलाई, 2012) और दूसरा 2,00,000 रुपये का (दिनांक 27 अप्रैल, 2012)। जब इन चेकों को 11 अगस्त, 2012 को बैंक में जमा किया गया, तो वे “अपर्याप्त धन” के कारण बाउंस हो गए। कानूनी नोटिस का जवाब न देने पर आरोपी के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई थी।
निचली अदालत ने 2 जून, 2016 को आरोपी को दोषी करार देते हुए तीन महीने की साधारण कैद और 3,38,000 रुपये के मुआवजे की सजा सुनाई थी। इस फैसले को बाद में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, वडोदरा ने भी सही ठहराया था, जिसके खिलाफ यह पुनरीक्षण आवेदन (Revision Application) हाईकोर्ट में दायर किया गया था।
आवेदक के मुख्य तर्क
आवेदक की ओर से पेश वकील ने मुख्य रूप से एनआई एक्ट की धारा 56 का सहारा लिया। उनके तर्क निम्नलिखित थे:
- आंशिक भुगतान का बचाव: आवेदक का कहना था कि शिकायतकर्ता ने स्वयं स्वीकार किया है कि उसे अप्रैल 2012 में 5,000 रुपये और मई 2012 में 7,000 रुपये प्राप्त हुए थे। तर्क दिया गया कि चूंकि चेक पर इस आंशिक भुगतान का कोई उल्लेख (Endorsement) नहीं था, इसलिए चेक पर लिखी राशि उस समय “कानूनी रूप से लागू ऋण” नहीं थी।
- नोटिस की तामील: आवेदक ने दावा किया कि उसे कानूनी नोटिस कभी मिला ही नहीं और रसीद पर उसके हस्ताक्षर फर्जी हैं।
- सुरक्षा चेक का दुरुपयोग: यह भी कहा गया कि ये चेक पुराने लेन-देन के लिए सुरक्षा (Security) के तौर पर दिए गए थे, जिनका शिकायतकर्ता ने दुरुपयोग किया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कानूनी प्रावधानों की व्याख्या की:
1. नोटिस और हस्ताक्षर की वैधता हाईकोर्ट ने पाया कि नोटिस उसी पते पर भेजा गया था जो अदालती कार्यवाही में उपयोग किया गया था। सी.सी. अलावी हाजी बनाम पलापेटी मोहम्मद (2007) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि केवल इनकार कर देने से नोटिस की तामील को गलत नहीं माना जा सकता। साथ ही, चूंकि चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार किए गए थे, इसलिए एनआई एक्ट की धारा 118 और 139 के तहत कानूनी धारणा (Presumption) आरोपी के खिलाफ थी।
2. धारा 56 और आंशिक भुगतान पर स्पष्टीकरण कोर्ट ने आंशिक भुगतान के समय और चेक की तारीखों पर गौर किया। जस्टिस सुथार ने उल्लेख किया:
“…अप्रैल और मई 2012 के लेन-देन के बाद चेक जारी किए गए थे, इसलिए आंशिक भुगतान को दर्ज करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। चेक जारी करने की तारीख पर, एक कानूनी रूप से लागू ऋण मौजूद था और राशि चुकाने का वादा किया गया था।”
हाईकोर्ट ने दशरथभाई त्रिकमभाई पटेल बनाम हितेश महेंद्रभाई पटेल (2023) के फैसले का संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया कि उस मामले में भुगतान चेक जारी होने के बाद हुआ था, जबकि यहाँ भुगतान चेक की प्रस्तुति से महीनों पहले हुआ था और आवेदक यह साबित नहीं कर सका कि वह भुगतान इन्हीं विशेष चेकों के लिए था।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालतों के निष्कर्षों में कोई “विकृति” (Perversity) नहीं है। अमित कपूर बनाम रमेश चंद्र (2012) के सिद्धांत को दोहराते हुए कोर्ट ने कहा कि पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार में तथ्यों का पुन: मूल्यांकन तभी किया जा सकता है जब फैसला पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण हो।
इन टिप्पणियों के साथ, हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण आवेदन को खारिज कर दिया और आरोपी को शेष सजा काटने के लिए तत्काल निचली अदालत में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण
- केस टाइटल: राजुभाई कालिदास चुनारा बनाम शांतिभाई कल्याणजीभाई शाह व अन्य।
- केस नंबर: आर/क्रिमिनल रिवीजन एप्लीकेशन नं. 984/2016
- बेंच: जस्टिस हसमुख डी. सुथार
- दिनांक: 18 मार्च, 2026

