लोक सेवक की मृत्यु से परिजनों के खिलाफ चल रही जब्ती की कार्यवाही अपने आप खत्म नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम, 2009 (BSCA) के तहत संपत्ति जब्त करने की कार्यवाही मुख्य आरोपी लोक सेवक की मृत्यु होने पर स्वतः समाप्त नहीं होती है। न्यायालय के अनुसार, यदि संपत्ति परिजनों या जीवनसाथी के नाम पर है और वे उस कार्यवाही का हिस्सा रहे हैं, तो लोक सेवक की मृत्यु के बाद भी इसे रद्द नहीं किया जा सकता।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने पटना हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें आरोपी अधिकारी की मृत्यु के आधार पर उसकी पत्नी सुधा सिंह के खिलाफ चल रही कार्यवाही को बंद कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने इन अपीलों को हाईकोर्ट में पुनर्स्थापित करते हुए निर्देश दिया है कि इनका निपटारा अब मेरिट (गुण-दोष) के आधार पर किया जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 2009 में भ्रष्टाचार निवारण (PC) अधिनियम के तहत दर्ज दो एफआईआर से जुड़ा है। निगरानी विभाग ने एक सरकारी अधिकारी रवींद्र प्रसाद सिंह पर 1975 से 2009 के बीच अपनी आय के ज्ञात स्रोतों से ₹12,96,516 अधिक की संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगाया था। इस मामले में 7 अक्टूबर, 2009 को आरोप पत्र दाखिल किया गया था।

BSCA के तहत 17 अगस्त, 2012 को अधिकारी और उनकी पत्नी सुधा सिंह को नोटिस जारी किए गए। प्राधिकृत अधिकारी ने 5 अगस्त, 2013 को आदेश पारित करते हुए चल और अचल संपत्तियों को जब्त करने का निर्देश दिया। आदेश में कहा गया कि सुधा सिंह पटना और नई दिल्ली में अपने नाम पर दर्ज संपत्तियों के लिए आय का वैध स्रोत बताने में विफल रहीं। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, लेकिन सुनवाई के दौरान ही 18 जनवरी, 2018 को रवींद्र प्रसाद सिंह का निधन हो गया। इसके बाद हाईकोर्ट ने यह कहते हुए कार्यवाही रद्द कर दी कि लोक सेवक की मृत्यु के बाद BSCA में कार्यवाही जारी रखने का कोई प्रावधान नहीं है।

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पक्षों की दलीलें

बिहार राज्य की ओर से दलील दी गई कि हाईकोर्ट का निष्कर्ष कानून की व्याख्या के अनुरूप नहीं है। राज्य का पक्ष था कि:

  • मुकदमे के दौरान संपत्ति की कुर्की और जब्ती (Confiscation) दो अलग प्रक्रियाएं हैं। BSCA के तहत जब्ती तब होती है जब मालिक संपत्ति के स्रोत की व्याख्या नहीं कर पाता।
  • योगेंद्र कुमार जायसवाल बनाम बिहार राज्य (2016) मामले का हवाला देते हुए कहा गया कि जब्ती की कार्यवाही अपने आप में पूरी तरह से आपराधिक कार्यवाही नहीं है, इसलिए अभियुक्त की मृत्यु पर कार्यवाही खत्म (Abatement) होने का सामान्य सिद्धांत यहाँ लागू नहीं होगा।
  • कानूनन जब्त संपत्ति वापस करने की केवल दो ही शर्तें हैं—या तो आरोपी बरी हो जाए या हाईकोर्ट मेरिट पर जब्ती के आदेश को रद्द कर दे।

प्रतिवादी (सुधा सिंह) का तर्क था कि BSCA की प्रक्रिया PC अधिनियम से अलग नहीं है। उनके अनुसार, पति की मृत्यु से पहले उनके खिलाफ कोई दोषसिद्धि नहीं हुई थी, इसलिए वे निर्दोष माने जाएंगे। साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि चूंकि वह स्वयं सरकारी सेवक नहीं थीं, इसलिए उनके खिलाफ अकेले यह कार्यवाही जारी नहीं रह सकती।

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न्यायालय का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने कार्यवाही के ‘खत्म होने’ (Abatement) और ‘बरी होने’ (Acquittal) के बीच के अंतर को समझाया। गुरमेल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2022) मामले का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा:

“‘Abatement’ का अर्थ मुकदमे के सामान्य निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले ही अभियुक्त की मृत्यु के कारण कार्यवाही का रुक जाना है… यह मामले के मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं होती।”

अदालत ने जोर दिया कि लोक सेवक की मृत्यु से उनकी पत्नी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जातीं, क्योंकि उन पर अवैध रूप से अर्जित संपत्ति को अपने पास रखने का आरोप है। गैर-लोक सेवकों की जवाबदेही पर पीठ ने पी. नल्लम्मल बनाम राज्य (1999) का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई परिजन लोक सेवक के कहने पर अवैध संपत्ति अपने नाम पर रखता है, तो वह भी दुष्प्रेरण (Abetment) का दोषी हो सकता है।

BSCA के प्रावधानों पर पीठ ने कहा:

“अधिनियम स्वयं उन स्थितियों को स्पष्ट करता है जिनमें जब्त की गई राशि या संपत्ति मालिक को वापस की जा सकती है… ये हैं: (क) हाईकोर्ट द्वारा जब्ती आदेश में संशोधन या उसे रद्द करना, या (ख) विशेष न्यायालय द्वारा बरी किया जाना। इनके अलावा किसी अन्य स्थिति की परिकल्पना कानून में नहीं की गई है।”

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पीठ ने ‘कानूनी उत्तराधिकारियों के प्रतिस्थापन’ (Substitution of legal heirs) के प्रावधान की कमी वाले तर्क को भी गलत बताया क्योंकि प्रतिवादी को कार्यवाही की शुरुआत से ही नोटिस दिया गया था।

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट को मुख्य आरोपी की मृत्यु के कारण कार्यवाही रद्द करने के बजाय मेरिट के आधार पर सुधा सिंह की अपील तय करनी चाहिए थी।

न्यायालय ने कहा, “किसी व्यक्ति की मृत्यु इस तथ्य को समाप्त नहीं करती कि पक्षों को सुनने के बाद जब्ती का आदेश दिया गया था।” इसी के साथ, सुधा सिंह और एक अन्य जुड़े हुए मामले (लोक सेवक नरेश पासवान की मृत्यु से संबंधित) में हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया गया और अपीलों को दोबारा सुनने का आदेश दिया गया।

केस विवरण ब्लॉक

  • केस का नाम: बिहार राज्य बनाम सुधा सिंह (संबंधित मामले के साथ)
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या [2026 की निर्धारित संख्या] (SLP (Crl.) No. 7454/2025 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह
  • दिनांक: 20 मार्च, 2026

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