‘उद्योग’ की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम: 9 जजों की बेंच ने सुरक्षित रखा फैसला

सुप्रीम कोर्ट की नौ-जजों की संविधान पीठ ने गुरुवार को औद्योगिक विवाद अधिनियम (ID Act), 1947 के तहत ‘उद्योग’ (Industry) शब्द की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी विवाद पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। तीन दिनों तक चली गहन सुनवाई के बाद कोर्ट अब यह तय करेगा कि लगभग पांच दशक पहले दी गई विस्तृत व्याख्या वर्तमान सामाजिक-आर्थिक परिवेश में कितनी सटीक है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस जोयमाल्य बागची, जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल हैं। यह बेंच 1978 के ऐतिहासिक ‘बेंगलुरु वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड’ मामले में दिए गए फैसले की समीक्षा कर रही है।

इस पूरे मामले के केंद्र में औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(j) है। साल 1978 में सात जजों की बेंच ने एक फैसला सुनाया था, जिसने ‘उद्योग’ के दायरे को काफी बढ़ा दिया था। जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर द्वारा लिखे गए उस फैसले के बाद शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल, क्लब और सरकारी कल्याणकारी विभागों में काम करने वाले लाखों कर्मचारी इस कानून के संरक्षण में आ गए थे।

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अब नौ जजों की बेंच इस बात की जांच कर रही है कि क्या 1978 के उस फैसले में बताए गए ‘ट्रिपल टेस्ट’ और पैराग्राफ 140 से 144 तक के तर्क आज भी कानूनन सही हैं। कोर्ट का मुख्य सरोकार यह है कि क्या सरकार द्वारा चलाए जा रहे सामाजिक कल्याण कार्यों और योजनाओं को भी ‘औद्योगिक गतिविधि’ माना जाना चाहिए।

तीन दिनों की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज और वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह, शेखर नाफड़े, सी.यू. सिंह और संजय हेगड़े सहित कई दिग्गज वकीलों की दलीलें सुनीं।

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बेंच ने न्यायिक मिसाल और बाद के कानूनों के बीच तालमेल बिठाने के लिए कुछ मुख्य बिंदु तय किए हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम, 1982 का कानूनी प्रभाव, जो संभवतः कभी लागू ही नहीं हो पाया।
  • इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020, जिसे 21 नवंबर, 2025 से लागू किया जाना है।

कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करेगा कि क्या 1978 की ‘विस्तृत व्याख्या’ ही आगे भी श्रम संबंधों को नियंत्रित करेगी या फिर सरकारी संस्थाओं और धर्मार्थ संस्थानों के लिए कोई सीमित परिभाषा अपनाई जाएगी।

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21 फरवरी, 1978 को बेंगलुरु वाटर सप्लाई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने श्रम कानूनों में क्रांतिकारी बदलाव किया था। उस समय कोर्ट ने मुनाफे के बजाय ‘गतिविधि की प्रकृति’ पर ध्यान केंद्रित किया था। इसके जरिए उन क्षेत्रों के कर्मचारियों को भी मनमानी छंटनी के खिलाफ सुरक्षा और सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining) जैसे अधिकार मिल गए थे, जिन्हें पहले उद्योग नहीं माना जाता था।

अब यह नौ-जजों की बेंच उस फैसले के बाद पैदा हुई विसंगतियों को दूर करने की कोशिश कर रही है, खासकर उन मामलों में जहां राज्य के संप्रभु (Sovereign) और कल्याणकारी कार्यों का सवाल जुड़ा है।

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