इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 [पूर्ववर्ती धारा 482 CrPC] के तहत दायर उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें तंत्र-मंत्र (ओझा) के बहाने एक महिला से बलात्कार करने के आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई थी। न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, जिसमें आरोपी द्वारा पीड़िता के अश्लील वीडियो अपने पास रखना शामिल है, मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए प्रथम दृष्टया आधार प्रदान करती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला (2024 का केस नंबर 68572) भदोही जिले के कोइरौना थाने में 16 फरवरी, 2024 को दर्ज की गई एक एफआईआर से शुरू हुआ था। एक विवाहित महिला ने आरोप लगाया कि आवेदक रोहित उपाध्याय, जो ओझा होने का दावा करता था, ने 16 फरवरी, 2022 से उसके साथ बार-बार बलात्कार किया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने महिला के दो साल के बेटे के इलाज के बहाने उसे रात 9:00 बजे अपने घर बुलाया। आरोप है कि उसने महिला को ‘प्रसाद’ में कोई नशीला पदार्थ मिलाकर दिया, जिससे वह बेहोश हो गई। होश आने पर पीड़िता ने अपनी गरिमा को भंग पाया। इसके बाद आरोपी ने कथित तौर पर महिला के “अश्लील वीडियो और फोटो” रिकॉर्ड करने का दावा करते हुए उसे ब्लैकमेल किया और डरा-धमकार बार-बार यौन शोषण किया।
पक्षों की दलीलें
आवेदक के वकील ने तर्क दिया कि यह मामला “झूठा और तुच्छ” है, जो पड़ोसी परिवारों के बीच लंबे समय से चली आ रही दुश्मनी का परिणाम है। बचाव पक्ष का दावा था कि कोई भी अश्लील सामग्री रिकॉर्ड नहीं की गई थी और दोनों के बीच यौन संबंध आपसी सहमति से थे, जिसे उन्होंने “प्रेम संबंध” बताया। यह भी कहा गया कि आवेदक ने गूगल पे (Google Pay) के माध्यम से पीड़िता के परिवार को पैसे भेजे थे, जो संबंधों के अलग स्वरूप की ओर इशारा करता है।
वहीं, राज्य के एजीए (AGA) और मुखबिर के वकील ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि आवेदक ने एक ओझा के रूप में अपनी स्थिति का फायदा उठाकर बच्चे के इलाज के बहाने पीड़िता का शोषण किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आवेदक ने स्वयं अपने हलफनामे के साथ “अश्लील वीडियो और तस्वीरें” संलग्न की हैं, जिन्हें उसने पहले ही वायरल करने की धमकी दी थी। अभियोजन ने यह भी आरोप लगाया कि जब पीड़िता अपने पति के साथ उड़ीसा रहने चली गई, तब भी आरोपी ने यौन संबंधों के लिए ब्लैकमेल करना जारी रखा।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने इस बात पर विचार किया कि क्या एफआईआर और धारा 161 व 164 CrPC के तहत दर्ज बयान मुकदमे को चलाने के लिए पर्याप्त हैं।
कोर्ट ने गौर किया कि आवेदक द्वारा पीड़िता के अश्लील वीडियो रखना—जो उसके द्वारा दाखिल पूरक हलफनामे से भी सिद्ध होता है—”प्रथम दृष्टया पीड़िता द्वारा एफआईआर और बयानों में लगाए गए आरोपों की पुष्टि करता है।” कोर्ट ने टिप्पणी की:
“आवेदक के पास ये वीडियो कैसे आए, यह मुकदमे (Trial) का विषय है, लेकिन यह प्रथम दृष्टया एफआईआर और धारा 161 व 164 CrPC के बयानों में पीड़िता द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि करता है… इसमें विचारणीय मुद्दे मौजूद हैं और आरोपी के खिलाफ मुकदमा जारी रखने के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है।”
अंतर्निहित शक्तियों के दायरे पर चर्चा करते हुए, कोर्ट ने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय बनाम हरियाणा राज्य (1977), हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल (1992) और सोम मित्तल बनाम कर्नाटक सरकार (2008) जैसे ऐतिहासिक मिसालों का हवाला दिया। कोर्ट ने दोहराया कि हालांकि कार्यवाही रद्द करने की शक्ति व्यापक है, लेकिन इसका उपयोग कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए “रारेस्ट ऑफ रेयर” (विरलतम) मामलों में ही अत्यंत सावधानी के साथ किया जाना चाहिए।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि रिकॉर्ड पर “पर्याप्त सामग्री” उपलब्ध है जिसके आधार पर आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है और यह मामला “रारेस्ट ऑफ रेयर” की श्रेणी में नहीं आता है।
कोर्ट ने आदेश दिया, “धारा 482 CrPC (अब 528 BNSS) के तहत आवेदन योग्यता विहीन है और तदनुसार इसे खारिज किया जाता है।” इसके साथ ही कोर्ट ने चार्जशीट या चल रही कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया।
केस विवरण
केस शीर्षक: रोहित उपाध्याय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
केस संख्या: आवेदन (धारा 482) संख्या – 34871/2024
पीठ: न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना
दिनांक: 18 मार्च, 2026

