पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने साल 2018 में कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ हुए अपहरण, सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के मामले के मुख्य साजिशकर्ता सांझी राम की उम्रकैद की सजा निलंबित करने की याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस गुरविंदर सिंह गिल और जस्टिस रमेश कुमारी की खंडपीठ ने मंदिर के पूर्व केयरटेकर की अर्जी पर सुनवाई करते हुए कहा कि वह “इस स्तर पर सजा के निलंबन की रियायत” का हकदार नहीं है।
6 मार्च को पारित यह आदेश हाल ही में उपलब्ध हुआ है, जिसने देश को झकझोर देने वाले इस जघन्य अपराध की ओर एक बार फिर सबका ध्यान खींचा है। हालांकि हाईकोर्ट ने सांझी राम को जमानत पर रिहा करने से इनकार कर दिया है, लेकिन अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि उसकी दोषसिद्धि के खिलाफ मुख्य अपील को इस साल सितंबर में अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए। कोर्ट ने यह भी संज्ञान में लिया कि वह पहले ही हिरासत में एक लंबा समय बिता चुका है।
तीन पन्नों के अपने संक्षिप्त आदेश में हाईकोर्ट ने मामले के गुण-दोष (merits) पर टिप्पणी करने से बचते हुए तत्काल राहत की मांग को ठुकरा दिया। बेंच ने स्पष्ट किया, “यह ऐसा मामला नहीं है जहां आवेदक/अपीलकर्ता इस स्तर पर सजा के निलंबन की रियायत का हकदार हो।” अदालत ने सीधे तौर पर कहा कि यह आवेदन खारिज किया जाता है।
सांझी राम की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विनोद घई ने तर्क दिया कि हालांकि अभियोजन पक्ष ने 114 गवाहों से पूछताछ की, लेकिन रिकॉर्ड पर ऐसा कोई “ठोस सबूत” नहीं लाया गया जो राम की प्रत्यक्ष संलिप्तता स्थापित कर सके। उन्होंने यह भी दलील दी कि राम आठ साल से अधिक की सजा काट चुका है और इसलिए उसे राहत मिलनी चाहिए।
जम्मू-कश्मीर राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता आर. एस. चीमा ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अपराध की गंभीरता पर जोर देते हुए कहा कि चूंकि ट्रायल कोर्ट पहले ही दोषसिद्धि दर्ज कर चुका है, इसलिए अब आवेदक के पास “निर्दोष होने का अनुमान” (presumption of innocence) उपलब्ध नहीं है। चीमा ने तर्क दिया कि गवाहों की गवाही और परिस्थितियों के आधार पर आरोपी की संलिप्तता “पूरी तरह स्पष्ट” है।
सांझी राम जम्मू के कठुआ क्षेत्र के एक छोटे से गांव में स्थित उस ‘देवस्थानम’ (मंदिर) का केयरटेकर था, जहां जनवरी 2018 में यह वारदात हुई थी। जम्मू-कश्मीर क्राइम ब्रांच की चार्जशीट के अनुसार, खानाबदोश समुदाय की आठ वर्षीय बच्ची का 10 जनवरी 2018 को अपहरण किया गया था। उसे चार दिनों तक मंदिर में नशीली दवाएं देकर रखा गया, बार-बार दरिंदगी की गई और अंततः पत्थर से कुचलकर उसकी हत्या कर दी गई।
देशव्यापी आक्रोश के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए 2018 में इस मामले को जम्मू-कश्मीर से पंजाब के पठानकोट स्थानांतरित कर दिया था। जून 2019 में, पठानकोट सत्र न्यायालय ने सांझी राम, उसके भतीजे परवेश कुमार और विशेष पुलिस अधिकारी दीपक खजूरिया को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। साक्ष्य मिटाने के आरोप में तीन अन्य पुलिसकर्मियों को पांच साल की कैद हुई थी।
मूल 432 पन्नों के फैसले में तत्कालीन सत्र न्यायाधीश तेजविंदर सिंह ने इस कृत्य को “राक्षसी और भयावह” बताया था। उन्होंने इस त्रासदी को बयां करने के लिए मिर्जा गालिब का एक शेर भी उद्धृत किया था: “पिनहा था दाम-ए-सख्त करीब आशियां के, उड़ने ही नहीं पाए थे कि गिरफ्तार हम हुए” (शिकारियों ने घोंसले के पास ही जाल बिछा रखा था और नन्हा परिंदा अपनी पहली उड़ान भरने से पहले ही कैद कर लिया गया)।
अब सितंबर में होने वाली अंतिम सुनवाई के साथ, 2019 की दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली कानूनी लड़ाई अगले महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है।

