उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के दो वरिष्ठ अधिकारियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकार को शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ताओं ने अपनी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें उनके वर्तमान पद से नीचे के रैंक पर तैनात करने का आदेश दिया गया है।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने दोनों सरकारों से यह स्पष्ट करने को कहा है कि अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की प्रक्रिया केंद्र की पहल पर शुरू हुई थी या राज्य सरकार ने खुद उनके नाम आगे बढ़ाए थे।
यह कानूनी विवाद उत्तराखंड कैडर के दो वरिष्ठ अधिकारियों— नीरू गर्ग (2005 बैच) और अरुण मोहन जोशी (2006 बैच) से जुड़ा है। वर्तमान में दोनों अधिकारी उत्तराखंड पुलिस में महानिरीक्षक (आईजी) के पद पर तैनात हैं।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक आदेश के अनुसार, नीरू गर्ग को भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) में उप महानिरीक्षक (डीआईजी) और अरुण मोहन जोशी को सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में उप महानिरीक्षक (डीजीआई) के पद पर तैनात किया गया है। अधिकारियों का तर्क है कि यह कदम प्रभावी रूप से उनकी पदावनति (डिमोशन) के समान है, क्योंकि उन्हें उनके वर्तमान आईजी रैंक से नीचे डीआईजी के पद पर भेजा जा रहा है।
याचिकाकर्ताओं का प्राथमिक तर्क यह है कि उन्होंने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए न तो कभी आवेदन किया और न ही अपनी सहमति दी। याचिका में निम्नलिखित बिंदुओं को रेखांकित किया गया है:
- सहमति का अभाव: अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने पहले ही केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के प्रति अपनी अनिच्छा व्यक्त की थी, जिसके बाद उन्हें पांच साल की अवधि के लिए ऐसी प्रतिनियुक्ति से वंचित (बैन) कर दिया गया था।
- राज्य सरकार की भूमिका: अधिकारियों का आरोप है कि इस प्रतिबंध के बावजूद, राज्य सरकार ने 16 फरवरी को उनके नाम केंद्र को भेज दिए, जिसके बाद प्रतिनियुक्ति के आदेश जारी किए गए।
- क्षेत्राधिकार का मुद्दा: सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने तर्क दिया कि अधिकारियों को इस मामले में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) जाना चाहिए। हालांकि, याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि चूंकि प्रस्ताव राज्य सरकार की ओर से शुरू हुआ था, इसलिए यह मामला हाईकोर्ट के समक्ष सुनवाई योग्य है।
कोर्ट ने प्रतिनियुक्ति प्रस्ताव के स्रोत पर स्पष्टीकरण मांगने के साथ-साथ याचिकाकर्ताओं को राज्य सरकार के शपथ पत्र के जवाब में अपना प्रत्युत्तर (रिज्वाइंडर) दाखिल करने की अनुमति दी है।
हाईकोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को करेगा, जिसमें इन तबादलों के पीछे की प्रशासनिक प्रक्रिया और नियमों की जांच की जाएगी।

