इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सहायता प्राप्त गैर-सरकारी स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसरों की भर्ती के लिए आयोजित लिखित परीक्षा (विज्ञापन संख्या 51) के परिणाम रद्द करने के राज्य सरकार के निर्णय को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब व्यापक अनियमितताएं और अनुचित साधन चयन प्रक्रिया की शुचिता को प्रभावित करते हैं, तो सार्वजनिक विश्वास बनाए रखने के लिए पूरी परीक्षा को रद्द करना न्यायोचित है।
यह आदेश जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने ‘कु. लक्ष्मी और 10 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ (रिट-ए संख्या 1760/2026) और अन्य संबद्ध याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
विज्ञापन संख्या 51 के तहत 910 असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर भर्ती के लिए 16 और 17 अप्रैल, 2025 को परीक्षा आयोजित की गई थी। परीक्षा के तुरंत बाद, लखनऊ के विभूति खंड और चिनहट थानों में दो प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि आरोपियों ने भारी धन लेकर अभ्यर्थियों को प्रश्नपत्र उपलब्ध कराए।
प्रारंभ में एक समिति की रिपोर्ट के आधार पर मूल्यांकन जारी रखने का निर्णय लिया गया था, लेकिन बाद में एसटीएफ (STF) की जांच में गंभीर खुलासे हुए। एसटीएफ रिपोर्ट के आधार पर उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग ने 20 जनवरी, 2026 को पुराना परिणाम रद्द कर नई परीक्षा की घोषणा कर दी। इसी निर्णय को 224 अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पक्षकारों के तर्क
याचिकाकर्ताओं के लिए: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अशोक खरे ने तर्क दिया कि पूरी परीक्षा रद्द करने के लिए राज्य के पास “पर्याप्त सामग्री” का अभाव था। उन्होंने कहा कि केवल 19 अभ्यर्थियों के संदिग्ध होने का मतलब यह नहीं है कि पूरी चयन प्रक्रिया दूषित हो गई। याचिकाकर्ताओं ने वंशिका यादव बनाम भारत संघ (2024) मामले का हवाला देते हुए कहा कि कुछ लोगों की गलती के लिए निर्दोष अभ्यर्थियों को सजा नहीं मिलनी चाहिए।
राज्य और आयोग के लिए: अपर महाधिवक्ता (AAG) श्री संजीव सिंह ने बताया कि जांच के बाद “संगठित अपराध” और “धोखाधड़ी” की धाराओं में चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। उन्होंने तर्क दिया कि यद्यपि 19 लाभार्थी स्पष्ट रूप से चिन्हित हुए हैं, लेकिन इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि पेपर अन्य अभ्यर्थियों तक भी पहुँचा हो। उन्होंने कहा कि 910 पदों की यह सीमित परीक्षा नीट (NEET) जैसी अखिल भारतीय परीक्षा से अलग है, जहाँ स्थानीय स्तर की गड़बड़ी भी पूरी शुचिता को खत्म कर देती है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी परीक्षा का “सर्वोपरि उद्देश्य” निष्पक्षता है। जस्टिस शमशेरी ने सुप्रीम कोर्ट के पश्चिम बंगाल राज्य बनाम बैशाखी भट्टाचार्य (2025) मामले के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए निम्नलिखित बिंदु रखे:
- प्रणालीगत दोष (Systemic Malaise): जब गहन जांच में व्यापक अनियमितता या धोखाधड़ी सामने आती है, तो पूरी प्रक्रिया को रद्द किया जाना चाहिए।
- संभावना का परीक्षण (Probability Test): प्रशासनिक स्तर पर परीक्षा रद्द करने के लिए किसी गड़बड़ी को “संदेह से परे” सिद्ध करना अनिवार्य नहीं है; साक्ष्यों में “तार्किक निश्चितता” पर्याप्त है।
- सीमित दायरा: हाईकोर्ट ने देखा कि एसटीएफ रिपोर्ट के अनुसार कम से कम पांच विषयों के पेपर लीक हुए थे, जो 910 पदों की चयन प्रक्रिया को दूषित करने के लिए पर्याप्त थे।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“जांच में प्रथम दृष्टया यह निष्कर्ष निकला है कि कम से कम 19 अभ्यर्थियों को निश्चित रूप से लाभ पहुँचा… इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि पेपर अन्य अभ्यर्थियों को भी लीक किए गए हों ताकि उन्हें चयन सूची में शामिल किया जा सके। अतः, विवादित निर्णय संभावना के परीक्षण (Probability Test) पर खरा उतरता है।”
याचिकाकर्ताओं के अधिकारों पर हाईकोर्ट ने कहा:
“याचिकाकर्ता यह दावा नहीं कर सकते कि वे अंतिम रूप से चयनित होने के कारण प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए हैं क्योंकि उन्हें अभी साक्षात्कार (Interview) की कठिन प्रक्रिया से गुजरना शेष था… किसी भी अभ्यर्थी के पास चयनित होने या राज्य को एक दूषित परीक्षा प्रक्रिया संपन्न करने के लिए मजबूर करने का कोई अजेय अधिकार (indefeasible right) नहीं है।”
निर्णय
रिट याचिकाओं को निस्तारित करते हुए, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिखित परीक्षा के परिणाम रद्द करने के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट ने माना कि यह निर्णय विस्तृत जांच और चयन प्रक्रिया की शुचिता भंग होने के ठोस प्रमाणों पर आधारित था। याचिकाकर्ता अब आयोग द्वारा घोषित नई परीक्षा में शामिल हो सकते हैं।
केस विवरण
- केस शीर्षक: कु. लक्ष्मी एवं 10 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (मुख्य वाद)
- रिट संख्या: रिट – ए संख्या 1760/2026
- पीठ: जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी
- दिनांक: 17 मार्च, 2026

