सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को साल 2000 में अपनी पत्नी की हत्या करने के आरोपी व्यक्ति की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा पहले दिए गए बरी करने के आदेश को खारिज करते हुए कहा कि दंपति की सबसे बड़ी बेटी की गवाही और पीड़िता के मृत्यु पूर्व बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) के बाद संदेह की “कोई गुंजाइश” नहीं रह जाती है।
जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने दोषी द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। दोषी ने कर्नाटक हाईकोर्ट के सितंबर 2010 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए उसे उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
घटना जुलाई 2000 की है। अपीलकर्ता और मृतक की शादी को घटना के समय 17 साल हो चुके थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, शुरुआती तीन साल वैवाहिक जीवन सुखद रहा, लेकिन उसके बाद संबंधों में खटास आ गई। यह आरोप लगाया गया था कि अपीलकर्ता ने अपनी पत्नी के साथ दुर्व्यवहार करना शुरू कर दिया और लगातार पैसों की मांग करने लगा, जिसे पीड़िता के पिता अक्सर पूरा करते थे।
जुलाई 2000 में, एक झगड़े के दौरान, अपीलकर्ता ने अपनी पत्नी पर मिट्टी का तेल (केरोसिन) डालकर आग लगा दी। उसे गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया, जहां तीन दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गई। मरने से पहले, उसने एक बयान दर्ज कराया था जिसमें उसने अपने पति को इस कृत्य का मुख्य अपराधी बताया था।
ट्रायल कोर्ट ने शुरुआत में इस तकनीकी आधार पर आरोपी को बरी कर दिया था कि जिस बाथरूम में घटना हुई वह बहुत छोटा था और वहां दो लोग एक साथ नहीं समा सकते थे। हालांकि, कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मुख्य रूप से दो साक्ष्यों को आधार बनाया: दंपति की बड़ी बेटी की चश्मदीद गवाही और पीड़िता का मृत्यु पूर्व बयान।
बेटी की गवाही पर पीठ ने कहा कि उसने घटना का वैसा ही वर्णन किया जैसा उसने अपनी आंखों से देखा था। बेंच ने टिप्पणी की:
“रिकॉर्ड पर ऐसा कोई तथ्य नहीं है जिससे यह पता चले कि वह अपने पिता के खिलाफ झूठी गवाही क्यों देगी। उसके बयान में कोई विसंगति नहीं है और उस पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं दिखता।”
इसके अलावा, कोर्ट ने ‘डाइंग डिक्लेरेशन’ की वैधता पर भी मुहर लगाई। पीड़िता का परीक्षण करने वाले दो डॉक्टरों के बयानों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि गंभीर चोटों के बावजूद वह बयान देने के लिए पूरी तरह सचेत (Conscious) अवस्था में थी। कोर्ट ने कहा:
“मृत्यु पूर्व बयान पर संदेह करने या यह सुझाव देने के लिए कोई प्रतिकूल सामग्री नहीं है कि इसे उचित रूप से रिकॉर्ड नहीं किया गया था या पीड़िता उस समय बयान देने की स्थिति में नहीं थी।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यह बयान डॉक्टर की अनुमति और इस संतुष्टि के बाद ही दर्ज किया गया था कि पीड़िता मानसिक रूप से फिट है।
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी करना उचित नहीं था क्योंकि वह फैसला गवाहों के बयानों में मामूली विसंगतियों पर आधारित था। पीठ ने माना कि साक्ष्यों से यह साबित होता है कि अपीलकर्ता ने झगड़ा किया, केरोसिन डाला और अपनी पत्नी को जलाया, जिससे उसकी मृत्यु हुई।
पीठ ने कहा:
“उपरोक्त निर्णायक साक्ष्यों को देखते हुए, अपीलकर्ता को बरी किए जाने की शायद ही कोई गुंजाइश बचती है।”
अदालत ने अपील को खारिज करते हुए जमानत पर बाहर चल रहे दोषी को तत्काल आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया ताकि वह अपनी शेष सजा पूरी कर सके।

