छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ₹26 लाख से अधिक की सरकारी राशि के गबन के आरोपी एक पुलिस आरक्षक (कांस्टेबल) की पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल की एकल पीठ ने सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए पुनर्रिचण (re-trial) के आदेश को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि जब गंभीर आपराधिक मामलों में अभियोजन पक्ष गवाहों को पेश करने में विफल रहता है, तो अदालत केवल एक “मूक दर्शक” बनकर नहीं रह सकती।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता सत्य प्रकाश भगत वर्ष 2008 में छत्तीसगढ़ पुलिस में आरक्षक के पद पर भर्ती हुआ था। वर्ष 2010 से वह पुलिस अधीक्षक कार्यालय, सरगुजा की वेतन शाखा में सहायक के रूप में कार्यरत था। उसका मुख्य कार्य कंप्यूटर के माध्यम से अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन देयक तैयार करना और ई-पेमेंट के जरिए राशि बैंक खातों में अंतरित करना था।
अभियोजन के अनुसार, भगत ने सिस्टम में हेरफेर कर अपने और अपने पिता के खातों में अवैध रूप से राशि स्थानांतरित की, जिसमें शामिल है:
- जून 2011 और 2012 में नक्सली भत्ते की राशि ₹1,610 के स्थान पर ₹16,100 अंतरित करना।
- वर्ष 2013 और 2014 में “स्पेशल राशन मनी” के नाम पर ₹650 के स्थान पर ₹6,50,000 की राशि तीन अलग-अलग मौकों पर निकालना।
- आरक्षक सुनील कुमार के नाम पर अपने पिता दयाराम भगत के खाते में ₹6,64,192 की राशि भेजना।
कुल मिलाकर ₹26,40,870 के गबन की शिकायत पर अंबिकापुर थाने में आईपीसी की धारा 420 और 409 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
निचली अदालत और अपील का घटनाक्रम
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, अंबिकापुर की अदालत ने 9 मार्च 2016 को आरोप तय किए थे। हालांकि, अभियोजन पक्ष को लगभग 28 अवसर दिए जाने और बार-बार समन व वारंट जारी होने के बावजूद एक भी गवाह का परीक्षण नहीं हो सका। इसे अभियोजन की अरुचि मानते हुए विचारण न्यायालय ने साक्ष्य का अवसर समाप्त कर दिया और 17 जनवरी 2020 को आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।
राज्य सरकार ने इस दोषमुक्ति को सत्र न्यायालय में चुनौती दी। पंचम अपर सत्र न्यायाधीश, अंबिकापुर ने दोषमुक्ति आदेश को रद्द करते हुए मामले को पुनः विचारण के लिए भेज दिया। सत्र न्यायालय ने कहा कि यह एक गंभीर अपराध है और अभियोजन को साक्ष्य पेश करने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
पक्षों के तर्क
पुनरीक्षणकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि विचारण न्यायालय ने पर्याप्त अवसर दिए थे और मुकदमे को अनिश्चितकाल तक नहीं चलाया जा सकता। उन्होंने दलील दी कि एक बार दोषमुक्त होने के बाद दोबारा अवसर देना विधि सम्मत नहीं है।
वहीं, राज्य की ओर से उपमहाधिवक्ता ने तर्क दिया कि इस मामले में गवाह भी सरकारी कर्मचारी हैं और उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करना पुलिस विभाग की जिम्मेदारी थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले बबलू कुमार बनाम बिहार राज्य (2015) का हवाला देते हुए कहा कि न्याय के हित में साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना उचित है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने बबलू कुमार मामले के सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए कहा:
“न्यायालय विचारण के दौरान केवल एक मौन दर्शक अथवा निष्क्रिय पर्यवेक्षक नहीं रह सकता, अपितु उसका यह विधिक दायित्व है कि वह यह सुनिश्चित करे कि न तो अभियोजन पक्ष और न ही अभियुक्त आपराधिक विचारण के साथ कोई टालमटोल या छल करें।”
न्यायमूर्ति जायसवाल ने इस बात पर चिंता जताई कि जब आरोपी और गवाह दोनों ही पुलिस विभाग से जुड़े थे, तब भी 28 अवसरों के बाद एक भी गवाह का न आना पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। कोर्ट ने माना कि समय बीतने के कारण कर्मचारियों के तबादले हुए होंगे, इसलिए अब किसी वरिष्ठ अधिकारी को यह जिम्मेदारी सौंपना आवश्यक है।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के निर्णय में किसी भी प्रकार की अवैधता नहीं पाई और पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- विचारण न्यायालय हर महीने कम से कम दो तिथियां साक्ष्य के लिए नियत करेगा।
- गवाहों को सीधे जमानती वारंट जारी किए जाएं।
- इन वारंटों की तामीली और गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी पुलिस महानिरीक्षक (IGP), सरगुजा रेंज, अंबिकापुर की होगी।
- मामले का विचारण 5 महीने के भीतर पूर्ण किया जाए।
हाईकोर्ट ने इस आदेश की प्रति पुलिस महानिदेशक (DGP), रायपुर को भी आवश्यक कार्यवाही हेतु भेजने का निर्देश दिया।
प्रकरण विवरण:
- मामले का नाम: सत्य प्रकाश भगत बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
- पुनरीक्षण क्रमांक: 323/2022
- पीठ: न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल
- दिनांक: 16 मार्च, 2026

