सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हैदराबाद के उद्योगपति निम्मगड्डा प्रसाद और संयुक्त अरब अमीरात की संप्रभु निवेश संस्था रास अल खैमाह इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी (RAKIA) के बीच चल रहे लगभग ₹500 करोड़ से अधिक के डिक्री विवाद को सुलझाने के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश यू.यू. ललित को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया है। अदालत ने दोनों पक्षों की सहमति के बाद यह कदम उठाया ताकि मामले का सौहार्दपूर्ण समाधान निकाला जा सके।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान यह बताया गया कि प्रसाद ने अदालत के पहले के निर्देशों का पालन करते हुए ₹125 करोड़ नकद सुरक्षा जमा कर दी है और तेलंगाना स्थित 37 एकड़ भूमि के मूल दस्तावेज भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर दिए हैं।
प्रसाद की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की प्रक्रिया में शामिल होने को तैयार हैं।
दूसरी ओर RAKIA की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी और गोपाल संकरणारायणन ने भी समयबद्ध मध्यस्थता पर सहमति जताई, लेकिन यह शर्त रखी कि प्रसाद की संपत्तियों की स्थिति यथावत रखी जाए और मध्यस्थता पूरी होने तक किसी तीसरे पक्ष का हित न बनाया जाए।
दोनों पक्षों की सहमति को दर्ज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति यू.यू. ललित को इस मामले में मध्यस्थ नियुक्त किया और उनसे विवाद का शीघ्र समाधान कराने के लिए प्रक्रिया संचालित करने का अनुरोध किया।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि मध्यस्थता हाइब्रिड मोड में की जाएगी ताकि RAKIA के प्रतिनिधि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से शामिल हो सकें। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति को ध्यान में रखते हुए की गई है।
पीठ ने अपने पहले के आदेश को स्पष्ट करते हुए कहा कि निम्मगड्डा प्रसाद अपने व्यवसायों के दैनिक संचालन, कर्मचारियों के वेतन और अन्य नियमित खर्चों के लिए धन का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन अदालत की अनुमति के बिना कोई अचल संपत्ति नहीं बेच सकते या हस्तांतरित नहीं कर सकते।
अदालत ने यह भी कहा कि मध्यस्थता के दौरान यदि आवश्यक हो तो संबंधित अन्य पक्षों को भी सुना जा सकता है। साथ ही, न्यायमूर्ति ललित अपने व्यावसायिक शुल्क और अन्य खर्चों का निर्धारण पक्षकारों से परामर्श करके करेंगे।
यह पूरा विवाद वर्ष 2008 की ‘वानपिक परियोजना’ से जुड़ा है, जिसमें आंध्र प्रदेश में बंदरगाहों और एक हवाई अड्डे के विकास के लिए संयुक्त उद्यम शुरू किया गया था।
RAKIA का आरोप है कि इस परियोजना के लिए निर्धारित 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि का निम्मगड्डा प्रसाद और RAKIA के पूर्व सीईओ खतर मस्साद ने मिलकर दुरुपयोग किया।
इसी मामले में यूएई की एक अदालत ने RAKIA के पक्ष में AED 267,941,374 की डिक्री पारित की थी, जो भारतीय मुद्रा में लगभग ₹543 करोड़ मूल राशि और ब्याज सहित लगभग ₹643 करोड़ बैठती है। RAKIA इस विदेशी डिक्री को भारत में लागू कराने की मांग कर रही है।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने प्रसाद को उनकी याचिका पर सुनवाई के लिए ₹600 करोड़ की सुरक्षा राशि देने का निर्देश दिया था।
इसके जवाब में प्रसाद ने तीन प्रकार की संपत्तियों को सुरक्षा के रूप में पेश किया था। इनमें लगभग ₹212 करोड़ मूल्य के शेयर और अन्य परिसंपत्तियां भी शामिल थीं, जिन्हें पहले ही वाणिज्यिक अदालतों द्वारा 5 सितंबर और 6 अक्टूबर 2023 के आदेशों के तहत कुर्क किया जा चुका था। अदालत ने इन परिसंपत्तियों को सुरक्षा के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
इसके अलावा प्रसाद ने तेलंगाना के मेडचल-मलकाजगिरि जिले के देवरायमजल गांव में स्थित 37 एकड़ भूमि को सुरक्षा के रूप में पेश किया, जिसकी कीमत लगभग ₹408 करोड़ बताई गई।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस भूमि के मूल दस्तावेज अदालत की रजिस्ट्री में जमा किए जाएं और यह शपथपत्र दिया जाए कि भूमि पर कोई भार नहीं है। साथ ही यह भी बताया जाए कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा पहले की गई कुर्की से संबंधित आदेशों के तहत आवश्यक इंडेम्निटी बॉन्ड दाखिल कर दिया गया है।
अदालत ने यह भी आदेश दिया था कि जमा की गई ₹125 करोड़ नकद राशि को सुप्रीम कोर्ट परिसर स्थित यूको बैंक में उच्च ब्याज वाली फिक्स्ड डिपॉजिट (FDR) में रखा जाए, जिसकी प्रारंभिक अवधि छह महीने होगी और यह स्वतः नवीनीकरण के साथ जारी रहेगी।
पीठ ने स्पष्ट किया कि यह अंतरिम व्यवस्था है और इससे किसी भी पक्ष के अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।
अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में पूर्व मुख्य न्यायाधीश यू.यू. ललित की मध्यस्थता से यह उम्मीद जताई जा रही है कि लंबे समय से चल रहे इस अंतरराष्ट्रीय वित्तीय विवाद का समाधान संभव हो सकेगा।

