दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले को रद्द कर दिया है जिसमें साक्ष्यों के अभाव में एक रिकवरी सूट (वसूली का मुकदमा) को खारिज कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 58 का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी पक्ष द्वारा तथ्यों को स्वीकार कर लिया जाता है, तो उन्हें साबित करने की आवश्यकता नहीं होती। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने स्पष्ट किया कि एक बार जब प्रतिवादी (देनदार) कर्ज लेना स्वीकार कर लेता है, तो सबूत का बोझ (Onus of Proof) उस पर स्थानांतरित हो जाता है कि वह कर्ज चुकाने के तथ्य को साबित करे।
अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि हालांकि बड़े नकद लेनदेन आयकर अधिनियम के तहत दंड को आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन यदि नागरिक मुकदमे (Civil Suit) में लेनदेन साबित हो जाता है, तो उसे केवल नकद होने के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता श्री मोती लाल ने ₹4,90,000 (मूलधन ₹3,00,000 और ब्याज ₹1,90,000) की वसूली के लिए मुकदमा दायर किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि मई 2017 में, उन्होंने प्रतिवादी श्री प्रेम चंद को 1% मासिक ब्याज पर ₹7,00,000 का नकद ऋण दिया था। प्रतिवादी ने 2 जून, 2017 को अपनी फर्म के लेटरहेड पर एक हस्तलिखित वचन पत्र/रसीद जारी की थी।
अपीलकर्ता के अनुसार, प्रतिवादी ने 2018 से 2020 के बीच तीन किश्तों में ₹4,00,000 वापस कर दिए, जिससे ₹3,00,000 का बकाया रह गया। कानूनी नोटिस के बावजूद शेष राशि का भुगतान न करने पर अपीलकर्ता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
ट्रायल कोर्ट ने 22 नवंबर, 2024 को इस आधार पर मुकदमा खारिज कर दिया था कि वादी (अपीलकर्ता) अपना मामला साबित करने के लिए साक्ष्य पेश करने में विफल रहा।
पक्षों की दलीलें
प्रतिवादी ने अपने लिखित बयान और गवाही (DW-1) में ₹7,00,000 का ऋण प्राप्त करने और वचन पत्र जारी करने की बात स्वीकार की। हालांकि, उसने दावा किया कि पूरा ऋण जुलाई 2017 में ही नकद में वापस कर दिया गया था। प्रतिवादी का तर्क था कि अपीलकर्ता के साथ “अच्छे संबंधों” के कारण पुनर्भुगतान की कोई रसीद नहीं ली गई थी।
अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 58 और धारा 103 के सिद्धांतों को समझने में विफल रहा। उनका कहना था कि चूंकि कर्ज लेने का तथ्य स्वीकार किया जा चुका था, इसलिए कर्ज चुकाने (Discharge of debt) को साबित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से प्रतिवादी पर थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने गौर किया कि प्रतिवादी की स्वीकारोक्ति के बाद कर्ज देने का बुनियादी तथ्य स्थापित हो चुका था।
अदालत ने कहा, “विवाद इस बात पर केंद्रित नहीं है कि ‘क्या ऋण दिया गया था’, जिसका बोझ वादी पर था, बल्कि यह प्रतिवादी के इस दावे तक सीमित है कि क्या जुलाई 2017 में पूरा ऋण नकद में चुका दिया गया था, जिसे साबित करने का भार प्रतिवादी पर है।”
अदालत ने प्रतिवादी (DW-1) और उसकी पत्नी (DW-2) की गवाही की जांच की और कई विसंगतियां पाईं:
- दस्तावेजों का अभाव: कोर्ट ने टिप्पणी की, “यह अत्यंत अविश्वसनीय और असंभव है कि ऋण लेते समय तो रसीद तैयार की गई, लेकिन उसे वापस करते समय उसकी पावती (Acknowledgement) के रूप में कोई दस्तावेज नहीं बनाया गया।”
- अस्पष्ट गवाही: प्रतिवादी पुनर्भुगतान की कोई निश्चित तारीख नहीं बता सका। वहीं उसकी पत्नी ने स्वीकार किया कि उसने न तो पैसे गिने थे और न ही वह नोटों की मूल्यवर्ग (Denominations) बता सकी।
- धन का स्रोत: अदालत ने कहा कि कर्ज लेने के मात्र एक महीने के भीतर इतनी “बड़ी राशि” की व्यवस्था करने के स्रोत को स्पष्ट करना आवश्यक था, जिसे प्रतिवादी समझाने में विफल रहा।
नकद लेनदेन की वैधता पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:
“यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि अपीलकर्ता और प्रतिवादी आयकर अधिकारियों के प्रावधानों का उल्लंघन कर सकते हैं, जो आयकर अधिनियम के तहत दंड को आकर्षित कर सकता है, लेकिन इस सिविल सूट में लेनदेन, भले ही नकद में हो, साबित हो गया है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादी कर्ज चुकाने के प्रमाण देने की जिम्मेदारी निभाने में “बुरी तरह विफल” रहा। इसके परिणामस्वरूप, अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और अपील स्वीकार कर ली।
अदालत ने अपीलकर्ता के पक्ष में ₹4,90,000 की डिक्री जारी की, साथ ही मुकदमा दायर करने की तारीख से वसूली तक 6% वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: मोती लाल बनाम प्रेम चंद
- केस नंबर: RFA 271/2025 और CM APPL 16971/2025
- पीठ: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा
- निर्णय तिथि: 13 मार्च, 2026

