मालिकाना हक का विवाद लंबित होने पर मकान मालिक-किरायेदार के संबंध के अभाव में हाईकोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगा: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रेंट कंट्रोल ट्रिब्यूनल और अथॉरिटी के आदेशों को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी संपत्ति के मालिकाना हक (Title) का विवाद सिविल कोर्ट में लंबित हो और वैधानिक अधिकारियों ने तथ्यों पर एक समान निष्कर्ष (Concurrent Findings) दर्ज किए हों, तो रिट कोर्ट को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की खंडपीठ ने कहा कि बेदखली की कार्यवाही के लिए “मकान मालिक” और “किरायेदार” के बीच कानूनी संबंध स्थापित होना एक बुनियादी आवश्यकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, श्रीमती हलीमा बेगम ने छत्तीसगढ़ रेंट कंट्रोल एक्ट, 2011 की धारा 12(2), अनुसूची II के तहत अपने पति और उनके भाइयों (प्रतिवादियों) के खिलाफ बेदखली और बकाया किराए की वसूली के लिए कार्यवाही शुरू की थी। उनका दावा था कि उन्होंने फरवरी 2000 में रायपुर में एक पंजीकृत बिक्री विलेख (Sale Deed) के माध्यम से 1500 वर्ग फुट की संपत्ति खरीदी थी।

याचिकाकर्ता के अनुसार, उनके ससुर स्वर्गीय नजीर अहमद मूल मालिक के पास किरायेदार थे और उनकी मृत्यु के बाद प्रतिवादी उस दुकान में किराना व्यवसाय करते रहे। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि संपत्ति खरीदने के बाद कानूनन प्रतिवादी उनके किरायेदार बन गए। दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि यह संपत्ति संयुक्त परिवार की आय से याचिकाकर्ता के नाम पर खरीदी गई थी और वे किरायेदार नहीं बल्कि सह-स्वामी के रूप में वहां काबिज हैं।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि निचले अधिकारियों ने मूल किरायेदारी के संबंध में प्रतिवादियों द्वारा की गई स्वीकारोक्ति पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 109 का हवाला देते हुए कहा कि खरीदार होने के नाते याचिकाकर्ता ने मूल मकान मालिक का स्थान ले लिया है। उन्होंने उत्सव डे बनाम सुशील कुमार भदराजा जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि रेंट एग्रीमेंट न होने मात्र से बेदखली की याचिका खारिज नहीं होनी चाहिए।

इसके विपरीत, प्रतिवादियों के वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता मकान मालिक और किरायेदार के कानूनी संबंध को साबित करने में विफल रही हैं। उन्होंने दलील दी कि न तो कोई रेंट एग्रीमेंट पेश किया गया और न ही किराए की रसीदें। साथ ही, याचिकाकर्ता खुद गवाही देने के लिए न्यायालय में उपस्थित नहीं हुईं। उन्होंने यह भी बताया कि संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर एक सिविल सूट पहले से ही हाईकोर्ट में प्रथम अपील (First Appeal) के रूप में लंबित है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने पाया कि रेंट कंट्रोल अथॉरिटी ने भले ही बिक्री विलेख के आधार पर याचिकाकर्ता के मालिकाना हक को माना, लेकिन मकान मालिक-किरायेदार के संबंध को साबित नहीं पाया। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“अटॉर्नमेंट (Attornment) के स्पष्ट साक्ष्य, किराए के भुगतान या किसी दस्तावेजी सबूत जैसे रेंट एग्रीमेंट या रसीद के अभाव में, जिससे यह पता चले कि प्रतिवादियों ने याचिकाकर्ता को दुकान के मालिक के रूप में स्वीकार किया था, अथॉरिटी ने सही निष्कर्ष निकाला कि दोनों पक्षों के बीच मकान मालिक-किरायेदार का संबंध मौजूद नहीं है।”

हाईकोर्ट ने आगे गौर किया कि खरीद के लगभग 15 वर्षों तक कोई किराया नहीं मांगा गया और पहला नोटिस केवल 2015 में जारी किया गया था। कोर्ट ने कहा कि पक्षकारों का आपस में पारिवारिक सदस्य होना भी उनके कब्जे की प्रकृति को समझने के लिए महत्वपूर्ण था।

संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप के दायरे पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दीपक टंडन बनाम राजेश कुमार गुप्ता (2019) मामले का उल्लेख करते हुए कहा:

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“यह कानूनन स्थापित है कि जहां मालिकाना हक से जुड़े मुद्दे सिविल कोर्ट में लंबित हों और वैधानिक अधिकारियों ने तथ्यों पर एक समान निष्कर्ष दर्ज किए हों, तो यह कोर्ट रिट क्षेत्राधिकार में साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं करेगा।”

न्यायालय का निर्णय

खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि मालिकाना हक से संबंधित एक प्रथम अपील (FA No. 18 of 2024) पहले से ही हाईकोर्ट के समक्ष लंबित है, और रेंट कंट्रोल अथॉरिटी व ट्रिब्यूनल दोनों ने किरायेदारी के सबूतों के अभाव में याचिका खारिज की है, इसलिए इसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

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हाईकोर्ट ने रिट याचिका को खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि इस कार्यवाही में की गई किसी भी टिप्पणी का लंबित सिविल अपील में पक्षों के अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

केस विवरण

  • केस टाइटल: श्रीमती हलीमा बेगम बनाम रफीक अहमद और अन्य
  • केस नंबर: WPC No. 1752 of 2023
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु
  • फैसले की तारीख: 11 मार्च, 2026

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