1990 का रिश्वत मामला: सुप्रीम कोर्ट ने आबकारी कांस्टेबल की सजा बरकरार रखी; उम्र को देखते हुए कारावास की अवधि घटाई

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के एक आबकारी कांस्टेबल, राज बहादुर सिंह की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है, जिन्हें 1990 के एक रिश्वत मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (P.C. Act) के तहत दोषी पाया गया था। जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने अपीलकर्ता की दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, हालांकि उसकी लगभग 75 वर्ष की वर्तमान आयु को ध्यान में रखते हुए सजा को घटाकर कानून में निर्धारित न्यूनतम अवधि तक सीमित कर दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला जून 1990 का है। अपीलकर्ता राज बहादुर सिंह उस समय उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले में आबकारी विभाग में कांस्टेबल के पद पर तैनात थे। शिकायतकर्ता कश्मीर सिंह (PW1), जो कथित तौर पर अवैध शराब के कारोबार में शामिल था, ने आरोप लगाया कि 16 जून 1990 को एक छापेमारी के दौरान अपीलकर्ता ने उसे कानूनी कार्रवाई से बचाने के बदले ₹500 की रिश्वत मांगी थी।

सतर्कता विभाग (Vigilance Department) ने 19 जून 1990 को खटीमा के एक रेस्तरां में जाल बिछाया (trap organized)। अभियोजन पक्ष के अनुसार, अपीलकर्ता के पास से ₹100 के पांच नोट बरामद किए गए जिन पर ‘फेनोल्फथलीन पाउडर’ लगा था। सोडियम कार्बोनेट के घोल में अपीलकर्ता के हाथ धुलवाने पर घोल का रंग गुलाबी हो गया, जिससे रिश्वत लेने की पुष्टि हुई।

ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट की कार्यवाही

3 मार्च 2006 को ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और धारा 13(2) के तहत दोषी ठहराया था। उसे धारा 7 के लिए एक वर्ष और धारा 13(2) के तहत दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। 13 अप्रैल 2012 को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की अपील खारिज कर सजा की पुष्टि कर दी थी।

पक्षों की दलीलें

सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता ने उसे झूठा फंसाया है ताकि उसका अवैध शराब का कारोबार बिना किसी बाधा के चल सके। यह भी तर्क दिया गया कि मुख्य गवाहों (PW1 और PW2) के बयानों में विरोधाभास था और रिश्वत के नोट कोर्ट में पेश नहीं किए गए थे। साथ ही, बचाव पक्ष ने कहा कि अपीलकर्ता को अधिनियम की धारा 21 के तहत खुद की गवाही देने का उचित अवसर नहीं मिला।

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इसके विपरीत, उत्तराखंड राज्य की ओर से दलील दी गई कि अभियोजन ने अपना मामला संदेह से परे साबित किया है। स्वतंत्र गवाह (PW2) ने पूरी घटना की पुष्टि की है और शिकायतकर्ता ने उन नोटों की पहचान की है जो आरोपी ने लिए थे।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता द्वारा दोषसिद्धि के खिलाफ दिए गए तर्कों को खारिज कर दिया। स्वतंत्र गवाह (shadow witness) की विश्वसनीयता पर पीठ ने कहा:

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“केवल इस आधार पर कि गवाह PW-2 शिकायतकर्ता PW-1 को जानता था, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह एक ‘इच्छुक गवाह’ (interested witness) था। किसी गवाह को ‘इच्छुक गवाह’ करार देने के लिए बचाव पक्ष को कोर्ट के सामने ऐसी सामग्री लानी चाहिए जिससे गवाह की शत्रुता स्पष्ट हो सके।”

कोर्ट ने नोटों को पेश न करने के तर्क पर टिप्पणी की कि यह आधार पहले किसी भी अदालत में नहीं उठाया गया था। पीठ ने हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष से भी सहमति जताई कि रेस्तरां मालिक (बचाव पक्ष का गवाह) विश्वसनीय नहीं था, क्योंकि एक स्थानीय निवासी होने के नाते वह किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ सच बोलने का जोखिम नहीं लेना चाहता होगा।

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कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि निचली अदालतों द्वारा दोषसिद्धि के संबंध में दिए गए निष्कर्षों में कोई त्रुटि नहीं है। हालांकि, सजा के मुद्दे पर कोर्ट ने उदार रुख अपनाया।

पीठ ने गौर किया कि अपराध के समय अपीलकर्ता की उम्र लगभग 40 वर्ष थी और अब वह लगभग 75 वर्ष का है। वह पहले ही करीब 2 महीने 24 दिन जेल में बिता चुका है। इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने कहा:

“हमारा यह मत है कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई और हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखी गई सजा को इन अपराधों के लिए निर्धारित न्यूनतम सजा तक संशोधित किया जा सकता है, अर्थात् धारा 7 के लिए 6 महीने और धारा 13(2) के लिए 1 वर्ष का कठोर कारावास।”

तदनुसार, कोर्ट ने सजा को संशोधित करते हुए अपील का निपटारा कर दिया।

केस विवरण:

  • केस का नाम: राज बहादुर सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1105/2013
  • जज: जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
  • फैसले की तारीख: 13 मार्च, 2026

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