सुप्रीम कोर्ट में जजों के बीच मतभेद: क्या 3 साल की प्रैक्टिस से सुधरेगी न्यायपालिका की तस्वीर?

सिविल जज (जूनियर डिवीजन) कैडर में भर्ती के लिए तीन साल की अनिवार्य वकालत के अनुभव को लेकर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में जजों के बीच अलग-अलग राय देखने को मिली। सुनवाई के दौरान जहां बेंच के एक सदस्य ने ‘कोचिंग कल्चर’ को रोकने के लिए अनुभव को जरूरी बताया, वहीं चीफ जस्टिस ने चिंता जताई कि इस कड़े नियम के कारण प्रतिभाशाली युवा न्यायिक सेवा से दूर हो सकते हैं।

चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच 20 मई 2025 के उस फैसले को लागू करने के तौर-तरीकों पर विचार कर रही थी, जिसने वकालत के अनुभव की शर्त को बहाल कर दिया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संक्रमण काल के दौरान किसी भी उम्मीदवार का नुकसान न हो, इसलिए सभी हाईकोर्ट और राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे विज्ञापित पदों के लिए आवेदन की समयसीमा 30 अप्रैल, 2026 तक बढ़ा दें।

एमिकस क्यूरी के चार सुझाव

अदालत की सहायता कर रहे एमिकस क्यूरी सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ भटनागर ने इस नियम को लागू करने के लिए चार प्रमुख विकल्प पेश किए:

  1. पूर्ण अनिवार्यता: नियम को बिना किसी बदलाव के सभी के लिए लागू रखा जाए।
  2. महिलाओं और दिव्यांगों को छूट: महिला उम्मीदवारों और दिव्यांगों (PwD) को बिना 3 साल का अनुभव पूरा किए परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जाए, लेकिन चयन के बाद ट्रेनिंग से पहले उन्हें प्रैक्टिस की अवधि पूरी करनी होगी।
  3. चरणबद्ध लागू करना: नियम को धीरे-धीरे लागू किया जाए— 2026 में शून्य वर्ष, 2027 में एक वर्ष, और 2029 तक इसे पूर्ण 3 वर्ष कर दिया जाए।
  4. दिव्यांगों के लिए विशेष प्रावधान: PwD उम्मीदवारों के लिए क्वालीफाइंग मार्क्स और आयु सीमा में छूट दी जाए।
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अनुभव बनाम योग्यता: बेंच में तीखी बहस

सुनवाई के दौरान जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने अनुभव के पक्ष में मजबूती से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, “मैं चीफ जस्टिस रहा हूं, सीनियर जज रहा हूं। यह पूरा मामला कोचिंग सेंटरों का है। हमने जजों के इंटरव्यू लिए हैं।” उन्होंने इस तर्क को खारिज कर दिया कि यह नियम नेशनल लॉ स्कूल (NLSIU) जैसे संस्थानों के मेधावी छात्रों को न्यायिक सेवा से दूर करेगा।

वहीं, चीफ जस्टिस सूर्यकांत का रुख कुछ अलग था। उन्होंने भविष्य की न्यायपालिका की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए कहा, “अगर आज आप मेधावी लोगों को नहीं चुनेंगे, तो पता नहीं अगले 20-40 सालों तक आपके पास कैसे लोग होंगे।” उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि 3 साल तक केवल कोर्ट में मौजूद रहने (पैसिव प्रेजेंस) से वास्तव में कितनी प्रैक्टिस होती है।

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CJI ने एक बीच का रास्ता सुझाते हुए कहा, “एक साल की प्रैक्टिस के बाद, एक साल ट्रेनिंग का हो सकता है और फिर प्रोबेशन शुरू हो सकता है। यह भी एक दृष्टिकोण हो सकता है।”

हाईकोर्ट्स की राय

एमिकस क्यूरी ने कोर्ट को बताया कि दिल्ली, पंजाब और हरियाणा, और जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख सहित सात हाईकोर्ट की समितियों ने इस नियम को बिना किसी छूट के लागू करने का समर्थन किया है। दिल्ली हाईकोर्ट की समिति का मानना है कि एक वर्ग को छूट देने से अन्य लोग भी ऐसी ही मांग करेंगे। वहीं त्रिपुरा हाईकोर्ट की समिति ने दिव्यांगों के लिए इस नियम को पूरी तरह हटाने का सुझाव दिया है।

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पृष्ठभूमि

शेट्टी कमीशन की सिफारिशों के बाद 2002 में न्यायिक सेवा के लिए 3 साल की प्रैक्टिस की शर्त हटा दी गई थी। हालांकि, पिछले साल ‘ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस शर्त को फिर से बहाल कर दिया। सीनियर एडवोकेट पिंकी आनंद ने उम्मीदवारों की ओर से दलील दी कि प्रैक्टिस की इस शर्त का न्यायिक कौशल से कोई सीधा संबंध नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट इस मामले के तौर-तरीकों को अंतिम रूप देने के लिए अगले सप्ताह फिर से सुनवाई करेगा।

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