टेरर फंडिंग मामला: लंबी जेल अवधि और ट्रायल की विसंगतियों के आधार पर अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह को सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत

एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम में, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कश्मीरी अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह को नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) द्वारा दर्ज टेरर फंडिंग मामले में जमानत दे दी है। शाह 4 जून, 2019 से हिरासत में थे।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने शाह की लंबी कैद और चल रहे ट्रायल में कुछ “विसंगतियों” (anomalies) को रेखांकित करते हुए यह आदेश पारित किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि विस्तृत आदेश बाद में जारी किया जाएगा, जिसमें शाह की रिहाई के लिए कुछ “कठोर जमानत शर्तें” निर्धारित की जाएंगी।

यह पूरा मामला 2017 में NIA द्वारा शुरू की गई एक जांच से जुड़ा है, जिसमें जम्मू-कश्मीर में शांति भंग करने की साजिश रचने के आरोप में 12 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया था। एजेंसी का आरोप था कि आरोपियों ने सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी करने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और केंद्र सरकार के खिलाफ “युद्ध छेड़ने” की साजिश के लिए धन जुटाया था।

शब्बीर अहमद शाह को जून 2019 में गिरफ्तार किया गया था। NIA का दावा था कि शाह ने अलगाववादी आंदोलन में “महत्वपूर्ण भूमिका” निभाई और जनता को उकसाया। आरोपों के अनुसार, उन्होंने मारे गए आतंकवादियों को “शहीद” बताकर उनका महिमामंडन किया और हवाला लेनदेन व क्रॉस-एलओसी व्यापार के जरिए फंड जुटाया, जिसका उपयोग कथित तौर पर विध्वंसक गतिविधियों के लिए किया गया।

सुनवाई के दौरान, शाह का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंसाल्वेस ने दलील दी कि उनके मुवक्किल लगभग पांच साल से जेल में हैं और ट्रायल अब तक पूरा नहीं हुआ है। बचाव पक्ष ने कहा कि इतनी लंबी अवधि तक हिरासत में रखना “त्वरित विचारण” (speedy trial) के सिद्धांत का उल्लंघन है।

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दूसरी ओर, NIA की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने जमानत का विरोध किया। एजेंसी ने दिल्ली हाईकोर्ट के 12 जून, 2025 के आदेश का हवाला दिया, जिसने शाह को राहत देने से इनकार कर दिया था। उस समय हाईकोर्ट ने कहा था कि शाह की रिहाई से गवाहों को प्रभावित करने और वैसी ही गैर-कानूनी गतिविधियों में फिर से शामिल होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ट्रायल की कछुआ गति पर चिंता जताई। सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने ट्रायल प्रक्रिया में कई विसंगतियों की ओर इशारा किया और विशेष रूप से शाह की “लंबी जेल अवधि” को आधार बनाया।

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हालांकि पिछले साल 4 सितंबर को शीर्ष अदालत ने अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया था, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ शाह की याचिका पर NIA को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। गुरुवार को दोनों पक्षों को सुनने के बाद, अदालत ने फैसला किया कि जमानत देना उचित है, बशर्ते विस्तृत फैसले में कड़ी शर्तें लगाई जाएं।

यह निर्णय दिल्ली हाईकोर्ट के उस रुख से अलग है, जिसमें कहा गया था कि अलगाववादी नारों और टेरर फंडिंग के आरोपों की गंभीरता व्यक्तिगत स्वतंत्रता की प्रार्थना से अधिक महत्वपूर्ण है।

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