दिल्ली की एक अदालत ने वकील पीयूष कुलश्रेष्ठ के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने का निर्देश दिया है। वकील पर आरोप है कि उन्होंने अपने मुवक्किलों को धोखा देने के लिए अदालत के फर्जी दस्तावेज तैयार किए और झूठी डिक्री बनवाई।
शाहदरा स्थित कड़कड़डूमा कोर्ट के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC-02) श्री अखिल मलिक ने शिकायतकर्ता कमलेश गुप्ता द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 156(3) के तहत दायर आवेदन का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किया।
मामले की पृष्ठभूमि
शिकायतकर्ता कमलेश गुप्ता और उनके पति दिनेश चंद्र गुप्ता लक्ष्मी नगर में ‘मैसर्स चंदर क्लॉथ हाउस’ के मालिक थे, जिस पर उनका 1972 से कब्जा था। शिकायत के अनुसार, आरोपी वकील पीयूष कुलश्रेष्ठ ने 2008 में उनके लिए एक दीवानी मुकदमा दायर किया था। 2009 में, आरोपी ने उन्हें कथित तौर पर सूचित किया कि दो मुकदमे उनके पक्ष में डिक्री हो गए हैं और उसने 4 अगस्त 2009 और 5 अक्टूबर 2009 की तारीख वाले निर्णयों की फोटोकॉपी उन्हें सौंपी। इन दस्तावेजों में प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession) के आधार पर उनके पक्ष में डिक्री होने का दावा किया गया था।
शिकायतकर्ता जून 2019 तक अपना व्यवसाय करती रहीं, जिसके बाद पुलिस ने उन्हें अदालत (SCJ/RC-East) के 30 मई 2019 के बेदखली नोटिस के आधार पर वहां से हटा दिया। बेदखली के बावजूद, आरोपी ने उन्हें आश्वासन दिया कि डिक्री वैध थी और जुलाई 2019 में ‘म्यूटेशन’ के नाम पर 10,000 रुपये की मांग भी की। वह 2021 तक व्हाट्सएप के माध्यम से उन्हें झूठे आश्वासन देता रहा।
धोखाधड़ी का खुलासा
अगस्त 2022 में, जब शिकायतकर्ता ने संबंधित केस (RC/ARC No. 869/16) के अदालती रिकॉर्ड का निरीक्षण किया, तो उन्हें पता चला कि आरोपी ने:
- बिना किसी अधिकार के मामले में पेशी दी थी।
- उनके पति के फर्जी हस्ताक्षर किए थे।
- अदालत की फर्जी डिक्री और आदेश तैयार किए थे।
- कार्यवाही का विरोध करने में विफल रहा, जिसके कारण अंततः उन्हें बेदखल होना पड़ा।
शिकायतकर्ता ने यह भी बताया कि आरोपी ने ‘एनेक्सचर ए-2’ और ‘एनेक्सचर ए-3’ के रूप में रिकॉर्ड पर मौजूद अदालती दस्तावेजों को भी फर्जी तरीके से तैयार किया था। मार्च 2023 में पुलिस स्टेशन फर्श बाजार में शिकायत दर्ज कराई गई थी, लेकिन कोई कार्रवाई न होने पर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया।
दलीलें और साक्ष्य
सुनवाई के दौरान, जांच अधिकारी (IO) एसआई हर्षवर्धन ने स्टेटस रिपोर्ट (ATR) दाखिल की, जिसमें कहा गया कि एनेक्सचर ए-2 में संलग्न दस्तावेज संदिग्ध प्रतीत होते हैं।
इसके अलावा, शिकायतकर्ता के वकील ने बार काउंसिल ऑफ दिल्ली की अनुशासन समिति द्वारा 6 नवंबर 2023 को पारित आदेश की प्रति पेश की। समिति ने पीयूष कुलश्रेष्ठ को “घोर कदाचार” (Gross Misconduct) का दोषी पाया था और उनके वकालत के लाइसेंस को 7 साल की अवधि के लिए निलंबित कर दिया था।
अदालत का विश्लेषण और निर्णय
दलीलों और स्टेटस रिपोर्ट पर विचार करने के बाद, श्री अखिल मलिक ने टिप्पणी की:
“प्रथम दृष्टया इस मामले में संज्ञेय अपराध बनता प्रतीत होता है। वर्तमान मामला क्लाइंट को धोखा देने के उद्देश्य से अदालत के फर्जी और नकली आदेश बनाने के गंभीर आरोपों से संबंधित है। कथित अपराध के काम करने के तरीके (Modus Operandi) और फर्जी दस्तावेज कैसे तैयार किए गए, यह पता लगाने के लिए पुलिस जांच आवश्यक है।”
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जालसाजी कैसे की गई, इसका खुलासा करने के लिए पुलिस जांच जरूरी है।
अंतिम निर्देश: अदालत ने संबंधित एसएचओ को प्रासंगिक धाराओं के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने और मामले की उचित जांच करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच अधिकारी आरोपी को तब तक गिरफ्तार करने के लिए बाध्य नहीं है जब तक कि उसके खिलाफ कोई विश्वसनीय सबूत न मिल जाए। जांच निष्पक्ष और तेजी से की जानी चाहिए और अंतिम रिपोर्ट जल्द से जल्द पेश की जानी चाहिए।
मामले में अनुपालन रिपोर्ट पेश करने के लिए अगली तारीख 20 मार्च 2026 तय की गई है।
- केस का शीर्षक: कमलेश गुप्ता बनाम पीयूष कुलश्रेष्ठ (थाना फर्श बाजार)
- केस संख्या: CT CASES 1664/2023
- शिकायतकर्ता के वकील: सुश्री ईशा कपूर और श्री जय सैनी

