मालिकाना हक का विवाद लंबित होने और मकान मालिक-किरायेदार संबंध सिद्ध न होने पर रिट कोर्ट साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रेंट कंट्रोल ट्रिब्यूनल और अथॉरिटी के आदेशों को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि जहां सक्षम सिविल कोर्ट में मालिकाना हक (टाइटल) का विवाद लंबित हो और वैधानिक अधिकारियों ने तथ्यों पर एकमत निष्कर्ष दर्ज किए हों, वहां रिट कोर्ट को अपने पर्यवेक्षी अधिकार क्षेत्र (Supervisory Jurisdiction) में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की खंडपीठ ने एक महिला द्वारा अपने ही पति और उनके भाइयों के खिलाफ दायर बेदखली याचिका को खारिज करने के फैसले को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि केवल स्वामित्व (Ownership) होना स्वतः ही मकान मालिक और किरायेदार के कानूनी संबंध को स्थापित नहीं करता है, विशेष रूप से पारिवारिक संदर्भ में।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता श्रीमती हलीमा बेगम ने छत्तीसगढ़ रेंट कंट्रोल एक्ट, 2011 की धारा 12(2) के तहत रेंट कंट्रोल अथॉरिटी के समक्ष कार्यवाही शुरू की थी। उन्होंने रायपुर स्थित 280 वर्ग फुट की एक दुकान से अपने पति (प्रतिवादी नंबर 1) और उनके पांच भाइयों (प्रतिवादी नंबर 2 से 6) को बेदखल करने और बकाया किराये की वसूली की मांग की थी।

याचिकाकर्ता के अनुसार, यह संपत्ति मूल रूप से राधाबाई की थी, जिसे उन्होंने 14 फरवरी, 2000 को पंजीकृत सेल डीड के माध्यम से खरीदा था। उनका दावा था कि उनके ससुर स्वर्गीय नजीर अहमद 1977-78 से 110 रुपये प्रति माह पर किरायेदार थे। उनकी मृत्यु के बाद, उनके उत्तराधिकारियों (प्रतिवादियों) ने दुकान में “अहमद किराना स्टोर्स” का व्यवसाय जारी रखा। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि संपत्ति खरीदने के बाद प्रतिवादी कानूनन उनके किरायेदार बन गए, लेकिन उन्होंने नियमित किराया नहीं दिया।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के तर्क: वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज परांजपे के माध्यम से याचिकाकर्ता ने दलील दी कि प्रतिवादियों ने मूल किरायेदारी और अपने कब्जे को स्वीकार किया था। उन्होंने तर्क दिया कि:

  • ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 109 के तहत, संपत्ति का खरीदार मूल मकान मालिक के स्थान पर आ जाता है।
  • लिखित किराया समझौता न होना बेदखली की कार्यवाही के लिए घातक नहीं है, जिसके लिए उन्होंने उत्सव डे बनाम सुशील कुमार भदराजा मामले का हवाला दिया।
  • निचले अधिकारियों ने उनकी ओनरशिप और मूल किरायेदारी से जुड़े स्पष्ट तथ्यों की अनदेखी की है।
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प्रतिवादियों के तर्क: प्रतिवादियों के वकील ने तर्क दिया कि यह विवाद अनिवार्य रूप से संयुक्त पारिवारिक संपत्ति से जुड़ा एक पारिवारिक मामला है। उन्होंने तर्क दिया कि:

  • यह संपत्ति “अहमद किराना स्टोर्स” की संयुक्त पारिवारिक आय से याचिकाकर्ता के नाम पर खरीदी गई थी।
  • उन्होंने मकान मालिक-किरायेदार के किसी भी संबंध से इनकार किया और दावा किया कि वे सह-मालिक के रूप में काबिज हैं।
  • पिछले 15 वर्षों से किराये के भुगतान या स्वामित्व स्वीकार करने का कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं था।
  • संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर एक सिविल सूट पहले से ही हाईकोर्ट में अपील (FA No. 18 of 2024) के अधीन है।
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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने नोट किया कि रेंट कंट्रोल अथॉरिटी ने सेल डीड के आधार पर याचिकाकर्ता के स्वामित्व को तो स्वीकार किया, लेकिन यह सही पहचान की कि “केवल मालिकाना हक होना… स्वतः ही मकान मालिक-किरायेदार का कानूनी संबंध स्थापित नहीं करता है।”

खंडपीठ ने टिप्पणी की:

“अटॉर्नमेंट (Attornment), किराये के भुगतान, या किसी दस्तावेजी प्रमाण जैसे रेंट एग्रीमेंट या रेंट रसीद की अनुपस्थिति में, जो यह दर्शा सके कि प्रतिवादियों ने याचिकाकर्ता को दुकान के मालिक के रूप में मान्यता दी थी, कोर्ट ने सही माना कि पक्षों के बीच मकान मालिक-किरायेदार का संबंध मौजूद नहीं है।”

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि खरीद के लगभग 15 साल बाद तक याचिकाकर्ता ने न तो किराये की मांग की और न ही प्रतिवादियों को किरायेदार मानते हुए कोई नोटिस जारी किया। कोर्ट ने कहा:

“मकान मालिक-किरायेदार के संबंध को तय करने के लिए याचिकाकर्ता का प्रतिवादियों के साथ पारिवारिक रिश्ता भी महत्व रखता है।”

सुप्रीम कोर्ट के दीपक टंडन और अन्य बनाम राजेश कुमार गुप्ता (2019) 5 SCC 537 मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि दो निचली अदालतों द्वारा तथ्यों पर दिए गए एकसमान निष्कर्ष रिट कोर्ट के लिए बाध्यकारी हैं और संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत इनमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि मालिकाना हक से जुड़ी एक प्रथम अपील (FA No. 18 of 2024) पहले से ही उसके समक्ष लंबित है, इसलिए वैधानिक अधिकारियों का रेंट कंट्रोल एक्ट के सारांश प्रावधानों (Summary Provisions) के तहत राहत देने से इनकार करना उचित था।

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हाईकोर्ट ने कहा:

“यह स्थापित कानून है कि जहां मालिकाना हक से संबंधित मुद्दे सक्षम सिविल कोर्ट के समक्ष विचाराधीन हों, और वैधानिक अधिकारियों ने तथ्यों पर एकमत निष्कर्ष दर्ज किए हों, यह कोर्ट रिट अधिकार क्षेत्र में सबूतों का पुनर्मूल्यांकन नहीं करेगा।”

इसी के साथ रिट याचिका को खारिज कर दिया गया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस कार्यवाही में की गई किसी भी टिप्पणी का लंबित प्रथम अपील में पक्षों के अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: श्रीमती हलीमा बेगम बनाम रफीक अहमद एवं अन्य
  • केस संख्या: WPC संख्या 1752/2023
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु
  • आदेश की तिथि: 11 मार्च, 2026

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