एक साल की बच्ची की कस्टडी मां को सौंपने का निर्देश; बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा- स्तनपान कराने वाली मां के पास ही सुरक्षित है बच्चे का हित

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में एक पिता को अपनी एक वर्षीय बेटी की कस्टडी उसकी अलग रह रही पत्नी को सौंपने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक छोटे बच्चे का सर्वोत्तम हित उसकी मां के पास रहने में ही निहित है, विशेष रूप से तब जब बच्चा अभी भी स्तनपान (breastfeeding) पर निर्भर हो।

न्यायमूर्ति एस वी कोटवाल और न्यायमूर्ति संदेश पाटिल की खंडपीठ ने मंगलवार को महिला द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। हाईकोर्ट ने मुंबई की विक्रोली पुलिस को निर्देश दिया है कि वह पिता से बच्ची की कस्टडी लेकर मां को सौंपने के लिए आवश्यक कदम उठाए।

याचिकाकर्ता और प्रतिवादी का विवाह वर्ष 2023 में हुआ था। महिला ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि शादी के बाद से ही उसे शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। पिछले महीने स्थिति तब बिगड़ गई जब पति और ननद ने उसके साथ कथित तौर पर मारपीट की।

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महिला का दावा है कि अपनी सुरक्षा के लिए उसे मजबूरन ससुराल छोड़ना पड़ा। उसने आरोप लगाया कि उस दौरान उसकी ननद ने उससे बच्ची छीन ली थी, जिसके कारण वह बच्ची को अपने साथ नहीं ले जा सकी। तब से एक वर्षीय बच्ची अपने पिता की कस्टडी में थी।

मां ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए मांग की कि बच्ची उसे वापस दिलाई जाए क्योंकि वह अभी बहुत छोटी है और स्तनपान पर निर्भर है। उसने तर्क दिया कि बच्चे के बेहतर पालन-पोषण और स्वास्थ्य के लिए मां का साथ अनिवार्य है।

दूसरी ओर, पति ने याचिका का विरोध करते हुए कहा:

  • पत्नी ने अपनी मर्जी से घर छोड़ा है और वह साथ रहने से इनकार कर रही है।
  • कानून के अनुसार, पिता भी बच्चे का स्वाभाविक अभिभावक (natural guardian) है।
  • पति ने यह भी तर्क दिया कि वह कमा रहा है जबकि पत्नी बेरोजगार है, इसलिए बच्चे का भविष्य उसके पास अधिक सुरक्षित है।
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खंडपीठ ने पति की दलीलों को खारिज करते हुए बच्चे के कल्याण को सर्वोपरि माना। कोर्ट ने गौर किया कि पति के कामकाजी होने के कारण वह बच्ची की उतनी देखभाल नहीं कर पाएगा जितनी उसकी मां कर सकती है, जो वर्तमान में अपने माता-पिता के साथ रह रही है।

बच्चे की जैविक और पोषण संबंधी जरूरतों पर जोर देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“बच्चा कुछ हद तक स्तनपान के लिए मां पर निर्भर है। यह एक महत्वपूर्ण विचारणीय बिंदु है।”

कोर्ट ने पति के व्यवहार पर भी कड़ा रुख अपनाया और उन व्हाट्सएप संदेशों का संज्ञान लिया जो उसने अपनी पत्नी को भेजे थे। कोर्ट ने पाया कि इन संदेशों में “अपमानजनक और गंदी भाषा” का प्रयोग किया गया था, जो महिला द्वारा लगाए गए प्रताड़ना के आरोपों की पुष्टि करते हैं।

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि महिला ने अपनी मर्जी से बच्ची को नहीं छोड़ा था। कोर्ट ने कहा, “महिला के इन आरोपों में दम है कि उसे अपनी सुरक्षा के डर से ससुराल छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था।” कोर्ट ने यह भी नोट किया कि बच्ची को उससे छीना गया था।

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“बच्चे के सर्वोत्तम हित” को प्राथमिकता देते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि कस्टडी मां को दी जानी चाहिए। विक्रोली पुलिस को तुरंत इस आदेश का पालन सुनिश्चित करने और बच्ची को उसकी मां से मिलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

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