इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई स्पेशल कोर्ट या मजिस्ट्रेट केवल इस आधार पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173(4) के तहत दायर आवेदन पर FIR दर्ज करने का निर्देश देने के लिए स्वचालित रूप से बाध्य नहीं है कि आवेदक अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय से है।
न्यायमूर्ति अनिल कुमार-X ने एक आपराधिक अपील को खारिज करते हुए कहा कि न्यायालय का न्यायिक विवेक बरकरार है और यह SC/ST अधिनियम के उन विशिष्ट प्रावधानों से सीमित नहीं होता है जो लोक सेवकों के कर्तव्यों को विनियमित करने के लिए बनाए गए हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह आपराधिक अपील (संख्या 2318 वर्ष 2026) कुसुम कन्नौजिया द्वारा विशेष न्यायाधीश (SC/ST अधिनियम), आजमगढ़ के 19 जनवरी 2026 के आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई थी। अपीलकर्ता ने FIR दर्ज करने के निर्देश की मांग करते हुए BNSS की धारा 173(4) (जो पूर्ववर्ती Cr.P.C. की धारा 156(3) के समान है) के तहत एक आवेदन दायर किया था। ट्रायल कोर्ट ने आरोपों की जांच करने के बाद आवेदन को खारिज कर दिया था, जिसके विरुद्ध यह अपील की गई।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि FIR दर्ज करने का निर्देश देने के बजाय जांच करने का ट्रायल कोर्ट का निर्णय कानूनी रूप से गलत था। आशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया कि SC/ST अधिनियम की धारा 4 और SC/ST नियमों के नियम 5 न्यायालय को ऐसी जांच करने से रोकते हैं। अपीलकर्ता का पक्ष था कि अधिनियम के तहत अपराध की सूचना मिलने पर न्यायालय को अनिवार्य रूप से FIR दर्ज करने का आदेश देना चाहिए।
दूसरी ओर, राज्य के अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA) ने तर्क दिया कि SC/ST अधिनियम स्पेशल कोर्ट्स पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगाता है। उन्होंने प्रस्तुत किया कि अदालतों का उद्देश्य केवल “पोस्ट ऑफिस” के रूप में कार्य करना नहीं है और धारा 173(4) BNSS के तहत आवेदनों पर विचार करते समय उनका न्यायिक विवेक सुरक्षित रहता है।
कोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने दो मुख्य प्रश्न निर्धारित किए: क्या स्पेशल कोर्ट SC/ST पीड़ितों के आवेदन पर FIR दर्ज करने का आदेश देने के लिए बाध्य है, और क्या SC/ST अधिनियम की धारा 4 व नियम 5 न्यायालय के न्यायिक विवेक को कम करते हैं।
अपीलकर्ता द्वारा प्रस्तुत आशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले पर हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि उस मामले में धारा 18-A के तहत कुछ जांचों को प्रतिबंधित माना गया था, लेकिन कानूनों के सूक्ष्म परीक्षण से एक अलग विधायी मंशा प्रकट होती है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि SC/ST अधिनियम की धारा 4 उन लोक सेवकों के दंड से संबंधित है जो अपने कर्तव्यों (जैसे FIR दर्ज न करना) में लापरवाही बरतते हैं। इसी तरह नियम 5 पुलिस अधिकारियों के लिए प्रक्रिया निर्धारित करता है।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“SC/ST अधिनियम, 1989 की धारा 4, धारा 18-A और नियम 5 मुख्य रूप से अधिनियम के तहत अपराधों के पंजीकरण और जांच के संबंध में पुलिस अधिकारियों और अन्य लोक सेवकों के कर्तव्यों को विनियमित करने के लिए हैं, और वे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 173(4) के तहत आवेदन पर विचार करते समय न्यायालय के न्यायिक विवेक को कम नहीं करते हैं।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि धारा 173(4) BNSS के तहत शक्ति विवेकाधीन है। सुप्रीम कोर्ट के प्रियंका श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को यांत्रिक रूप से FIR का आदेश नहीं देना चाहिए बल्कि न्यायिक मस्तिष्क का प्रयोग करना चाहिए। इसके अलावा, हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने जोर दिया कि SC/ST अधिनियम के मामलों में भी न्यायालय को यह देखना चाहिए कि क्या आरोप प्रथम दृष्टया पीड़ित की जाति से जुड़े अपराध को दर्शाते हैं।
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि स्पेशल कोर्ट FIR दर्ज कराने का महज एक जरिया (conduit) नहीं है। कोर्ट ने कहा:
“स्पेशल कोर्ट या मजिस्ट्रेट हर मामले में केवल इसलिए FIR दर्ज करने का निर्देश देने के लिए बाध्य नहीं है क्योंकि आवेदक अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय से है। न्यायालय को पहले उसके सामने रखे गए आरोपों का मूल्यांकन करना चाहिए और उसके बाद यह तय करना चाहिए कि पुलिस द्वारा जांच का निर्देश देना उचित है या मामले को शिकायत केस (complaint case) के रूप में आगे बढ़ाना है।”
आरोपों की जांच करने और न्यायिक विवेक का उपयोग करने के ट्रायल कोर्ट के दृष्टिकोण में कोई अवैधता न पाते हुए, हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी।
केस विवरण:
- केस का शीर्षक: कुसुम कन्नौजिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 6 अन्य
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2318 वर्ष 2026
- न्यायाधीश: न्यायमूर्ति अनिल कुमार-X

