सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश के विभाजन के बाद जिन गन्ना उत्पादक सहकारी समितियों का कार्यक्षेत्र केवल एक राज्य तक सीमित रह गया था, उन्हें मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव सोसाइटीज (MSCS) नहीं माना जा सकता।
जस्टिस पमिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव सोसाइटीज एक्ट, 2002 (2002 एक्ट) की धारा 103 के तहत उत्पन्न ‘डीमिंग फिक्शन’ (कानूनी कल्पना) उन पुनर्गठन कार्यों को स्वतः अमान्य नहीं करती है जो उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 (रीऑर्गेनाइजेशन एक्ट) के तहत पहले ही पूरे किए जा चुके हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद बाजपुर और गदरपुर की दो गन्ना उत्पादक सहकारी समितियों की कानूनी स्थिति को लेकर था। मूल रूप से, इन समितियों का कार्यक्षेत्र उन गांवों तक फैला हुआ था जो अब उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों में बंटे हुए हैं।
9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड के गठन के बाद, फरवरी 2001 में दोनों राज्यों के अधिकारियों की एक बैठक हुई। इसमें इन समितियों के पुनर्गठन का निर्णय लिया गया। इसके बाद 2002 और 2003 में औपचारिक आदेश पारित कर उत्तर प्रदेश में आने वाले गांवों को इन समितियों के कार्यक्षेत्र से हटा दिया गया, जिससे इनका संचालन केवल उत्तराखंड तक सीमित हो गया।
हालांकि, बाजपुर समिति के एक सदस्य ने सदस्यता से बाहर किए जाने को चुनौती दी। इसके परिणामस्वरूप 2004 में एक आर्बिट्रेशन अवार्ड आया, जिसमें कहा गया कि 2002 एक्ट की धारा 103 के बल पर यह समिति पुनर्गठन की तिथि (09.11.2000) से ही मल्टी-स्टेट सोसाइटी बन गई थी। हाईकोर्ट ने 2007 में इस विचार को बरकरार रखा और सेंट्रल रजिस्ट्रार को चुनाव कराने का निर्देश दिया, जिसे उत्तराखंड सरकार और अन्य प्रभावित पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि 2002 एक्ट की धारा 103 केवल इसलिए किसी समिति को मल्टी-स्टेट का दर्जा नहीं देती क्योंकि मूल राज्य का पुनर्गठन हुआ है। उन्होंने दलील दी कि इसके लिए समिति के ‘उद्देश्यों’ (objects) की तथ्यात्मक जांच आवश्यक है।
प्रतिवादियों ने 2002 अधिनियम का हवाला देते हुए तर्क दिया कि चूंकि पुनर्गठन अधिनियम के लागू होने के समय समितियां दो राज्यों में कार्य कर रही थीं, इसलिए वे कानूनी रूप से ‘डीम्ड’ मल्टी-स्टेट सोसाइटी मानी जाएंगी।
अधिकारियों का पक्ष रखते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने पुनर्गठन अधिनियम की धारा 87 की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि दोनों राज्यों ने निर्धारित दो साल की संक्रमण अवधि के भीतर समितियों को दो अलग-अलग राज्य सहकारी संस्थाओं में विभाजित करने के लिए आवश्यक कदम पहले ही उठा लिए थे।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्गठन अधिनियम और 2002 एक्ट के बीच के संबंधों का विश्लेषण किया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि पुनर्गठन अधिनियम की धारा 87 ‘विधायी निरंतरता’ प्रदान करती है, जिससे मौजूदा कानून तब तक लागू रहते हैं जब तक उन्हें बदला न जाए। महत्वपूर्ण रूप से, पुनर्गठन अधिनियम की धारा 93 में एक ‘नॉन-ऑब्स्टांटे क्लॉज’ (गैर-अवरोधक खंड) है, जो इसे अन्य कानूनों पर प्राथमिकता देता है।
2002 एक्ट की धारा 103 के तहत कानूनी कल्पना (legal fiction) की प्रकृति पर कोर्ट ने टिप्पणी की:
“यह एक स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि किसी कानूनी कल्पना (legal fiction) को केवल उसी उद्देश्य तक सीमित रखा जाना चाहिए जिसके लिए इसे बनाया गया है और इसे इसके वैध क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। लीगल फिक्शन्स गढ़े हुए उपकरण हैं, जो उद्देश्य में सटीक और पहुंच में सीमित होते हैं।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि मल्टी-स्टेट सोसाइटी का दर्जा उसके ‘उद्देश्यों’ के तथ्यात्मक निर्धारण पर निर्भर है। स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम मिलकियत सिंह (2025) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“इस कोर्ट ने ‘उद्देश्यों’ (objects) और ‘कार्यक्षेत्र’ (area of operation) के बीच वैचारिक अंतर पर जोर दिया है और यह स्पष्ट किया है कि सदस्यों का निवास या गतिविधियों का भौगोलिक विस्तार उस वैधानिक आवश्यकता का विकल्प नहीं हो सकता कि मुख्य उद्देश्य स्वयं मल्टी-स्टेट चरित्र के होने चाहिए।”
पीठ ने पाया कि इन समितियों के उप-नियम (bye-laws) केवल स्थानीय गन्ना उत्पादकों के हितों की रक्षा तक सीमित थे और उनमें राज्य की सीमाओं के पार सदस्यों की सेवा करने का कोई इरादा नहीं झलकता था।
कोर्ट का निर्णय
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि उत्तर प्रदेश के विभाजन के बाद समितियों के पुनर्गठन के निर्णय पुनर्गठन अधिनियम की धारा 87 और 93 के तहत वैध थे। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि 2002 एक्ट की धारा 103 “पहले से पूर्ण हो चुके कार्यों को पूर्वव्यापी प्रभाव से अमान्य नहीं कर सकती।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“पुनर्गठन अधिनियम का सर्वोपरि प्रभाव और 2002 अधिनियम की धारा 103 का प्रभाव एक सामंजस्यपूर्ण निर्माण की मांग करता है, जिसके द्वारा कानूनी कल्पना के संचालन को उन मामलों में प्रतिबंधित किया जाना चाहिए जहाँ समितियों के पुनर्गठन की कार्रवाई पहले ही की जा चुकी है और उन समितियों के संबंध में जिनके उद्देश्य और कार्यक्षेत्र एक ही राज्य तक सीमित हैं।”
परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 2007 के फैसले को रद्द कर दिया और घोषित किया कि बाजपुर और गदरपुर समितियां मल्टी-स्टेट सहकारी समितियां नहीं हैं। राज्य सहकारी कानून के तहत अधिकारियों को इन समितियों के चुनाव जल्द से जल्द कराने का निर्देश दिया गया है।
- केस शीर्षक: रजिस्ट्रार केन को-ऑपरेटिव सोसाइटीज और अन्य बनाम गुरदीप सिंह नरवाल (मृतक) कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से और अन्य (संबद्ध अपीलों के साथ)
- सिविल अपील संख्या: 2013 की 8743

