गर्भवती पत्नी की हत्या के दोषी की उम्रकैद बरकरार: कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा—“आरोपी ने दो जिंदगियां खत्म कीं”

कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपनी गर्भवती पत्नी की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि आरोपी के कृत्य के कारण केवल एक नहीं बल्कि दो जिंदगियों का अंत हुआ। अदालत ने सत्र न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए आरोपी को “निर्दयी और ठंडे दिमाग से हत्या करने वाला” बताया।

न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा और न्यायमूर्ति राय चट्टोपाध्याय की खंडपीठ ने राम चंद्र प्रमाणिक द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि हावड़ा सत्र न्यायालय द्वारा दी गई दोषसिद्धि और सजा में किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

मामला 21 जनवरी 2014 का है। मृतका संपा प्रमाणिक की शादी आरोपी से लगभग दस वर्ष पहले हुई थी। रिकॉर्ड के अनुसार, उस दिन आरोपी ने अपनी पत्नी पर एक कुंद हथियार से कई बार हमला किया और बाद में उसका गला दबाकर हत्या कर दी।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने विशेष रूप से इस तथ्य पर ध्यान दिया कि घटना के समय पीड़िता लगभग 18 सप्ताह की गर्भवती थी। अदालत ने कहा कि यह मानना स्वाभाविक है कि पति को अपनी पत्नी की गर्भावस्था के बारे में जानकारी थी।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में यह सामने आया था कि मृतका के विसरा में शराब के अंश पाए गए थे और संभव है कि वह हल्की नशे की स्थिति में रही हो। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह परिस्थिति आरोपी के हिंसक आचरण को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहरा सकती।

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अपने निर्णय में खंडपीठ ने कहा कि आरोपी के कृत्य से दो जिंदगियां समाप्त हो गईं और उसका व्यवहार अत्यंत अमानवीय तथा लापरवाह था।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि हमले की प्रकृति से संकेत मिलता है कि यह हमला कुछ मिनटों का नहीं था, बल्कि लगभग 20 से 30 मिनट तक चला, जिसके परिणामस्वरूप पीड़िता की मृत्यु हो गई।

अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए जो सजा सुनाई थी, वह पूरी तरह उचित है।

उल्लेखनीय है कि हावड़ा के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, द्वितीय न्यायालय ने मार्च 2017 में राम चंद्र प्रमाणिक को हत्या के अपराध में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा है।

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