बॉम्बे हाईकोर्ट ने नासिक फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए एकपक्षीय (ex-parte) तलाक के आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल व्हाट्सएप चैट पर भरोसा करके तलाक की डिक्री जारी नहीं की जा सकती, जब तक कि उन साक्ष्यों को कानूनी प्रक्रिया के तहत सिद्ध न किया गया हो। जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को उचित गवाही के माध्यम से प्रमाणित किया जाना चाहिए और पत्नी को क्रूरता के आरोपों का खंडन करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता (पत्नी) ने नासिक फैमिली कोर्ट द्वारा 27 मई, 2025 को याचिका संख्या A-185/2024 में पारित फैसले को चुनौती दी थी। यह याचिका पति द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग करते हुए दायर की गई थी। फैमिली कोर्ट ने पत्नी की अनुपस्थिति में पति के पक्ष में एकपक्षीय फैसला सुनाया था, जिसमें मुख्य रूप से व्हाट्सएप और एसएमएस संदेशों को आधार बनाया गया था।
फैमिली कोर्ट का विश्लेषण
फैमिली कोर्ट ने अपने निष्कर्ष में कहा था कि पति के साथ पत्नी द्वारा मानसिक क्रूरता की गई है। निचली अदालत के जज ने टिप्पणी की थी:
“याचिकाकर्ता (पति) की निर्विवाद गवाही को पक्षों के बीच व्हाट्सएप चैट और एसएमएस चैट से समर्थन मिलता है। चैट से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि प्रतिवादी-पत्नी नासिक के बजाय पुणे जाने के लिए जोर दे रही थी… कुछ चैट प्रतिवादी द्वारा भाभी और सास के लिए इस्तेमाल किए गए अपमानजनक संदेशों को दर्शाते हैं।”
निचली अदालत ने यह भी कहा था कि पति से यह कहना कि उसकी बहन उसकी पत्नी के रूप में “रोल प्ले” करेगी, गंभीर मानसिक क्रूरता है। अदालत का मानना था कि पति के नासिक में ‘वर्क फ्रॉम होम’ मोड में काम करने के बावजूद पुणे शिफ्ट होने की पत्नी की मांग और उसके लिए “दबाव की रणनीति, भावनात्मक ब्लैकमेल और अभद्र भाषा” का उपयोग करना तलाक का आधार बनता है।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद, बॉम्बे हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट का फैसला ऐसी गवाही पर आधारित था जिसका खंडन करने का मौका पत्नी को नहीं मिला। बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि इलेक्ट्रॉनिक संदेशों को बिना प्रमाणित किए तलाक का एकमात्र आधार बनाना कानूनी रूप से गलत है। हाईकोर्ट ने कहा:
“महज व्हाट्सएप चैट के भरोसे तलाक की डिक्री नहीं दी जा सकती, क्योंकि इसे साक्ष्य पेश करके सिद्ध नहीं किया गया है। इसलिए, हमारे अनुसार, फैमिली कोर्ट को मामला वापस भेजकर (रिमांड) तलाक के फैसले और डिक्री को रद्द करने की आवश्यकता है, ताकि अपीलकर्ता-पत्नी को सुना जा सके और साक्ष्य पेश करने की स्वतंत्रता दी जा सके।”
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने नासिक फैमिली कोर्ट के 27 मई, 2025 के आदेश को रद्द करते हुए मामले को पुनः सुनवाई के लिए वापस भेज दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि सभी मुद्दों पर साक्ष्य पेश करने के लिए दोनों पक्षों को अवसर दिया जाए।
खंडपीठ ने यह भी सुझाव दिया कि यदि दोनों पक्ष चाहें तो वे मध्यस्थता (Mediation) के माध्यम से समझौते की संभावना भी तलाश सकते हैं। इसके साथ ही फैमिली कोर्ट अपील और लंबित अंतरिम आवेदन का निपटारा कर दिया गया।

