बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन निगम (MSRTC) को निर्देश दिया है कि कोविड-19 के दौरान ड्यूटी करते हुए संक्रमित होकर मृत कर्मचारी की पत्नी को ₹50 लाख का मुआवज़ा दिया जाए। अदालत ने कहा कि महामारी के दौर में ड्यूटी निभाने वाले कर्मचारी के साथ निगम तकनीकी आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता।
न्यायमूर्ति मकरंद कर्णिक और न्यायमूर्ति श्रीराम मोडक की पीठ ने 24 फरवरी को यह आदेश पारित किया। याचिकाकर्ता सुनीता बापू जगताप ने MSRTC के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनमें जनवरी 2022 और मार्च 2023 में उनका मुआवज़े का दावा यह कहकर खारिज कर दिया गया था कि उनके पति “आवश्यक सेवाओं” में तैनात नहीं थे और वे अंतरराज्यीय बस चालक भी नहीं थे।
हाई कोर्ट ने कहा कि MSRTC ने महामारी की गंभीर स्थिति को नजरअंदाज करते हुए बहुत संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाया। उस समय आम जनजीवन ठप था और सीमित रूप से ही सार्वजनिक परिवहन जैसी सेवाएँ चल रही थीं। ऐसे हालात में जो कर्मचारी ड्यूटी पर पहुंचे, उन्होंने अपने जीवन को जोखिम में डालकर काम किया।
पीठ ने दर्ज किया कि मृतक बापू जगताप को 24 से 28 मार्च 2021 के बीच वडाला स्थित BEST बस डिपो में ट्रैफिक पर्यवेक्षण के लिए लगाया गया था। इसके बाद वे अस्वस्थ हो गए और 29 से 31 मार्च तक अवकाश लेकर नाशिक जिले के मनमाड लौट गए।
स्थानीय औषधालय में उपचार के दौरान 5 अप्रैल 2021 को उनकी कोविड रिपोर्ट पॉजिटिव आई और दो दिन बाद येवला के उप-जिला अस्पताल में कोविड निमोनिया से उनकी मृत्यु हो गई।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के पति का ड्यूटी पर उपस्थित होना उनके कर्तव्य का हिस्सा था और उन्होंने यह काम “अपने जीवन के जोखिम पर” किया। अदालत ने यह भी माना कि संभव है कि उन्हें संक्रमण ड्यूटी के दौरान ही हुआ हो।
पीठ ने स्पष्ट किया कि MSRTC केवल इस आधार पर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता कि मृतक चालक नहीं था या अंतरराज्यीय परिवहन में तैनात नहीं था।
इन टिप्पणियों के साथ हाई कोर्ट ने निगम को सुनीता जगताप को ₹50 लाख का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया। यह फैसला महामारी के दौरान ड्यूटी करने वाले कर्मचारियों के अधिकारों को मान्यता देने के रूप में देखा जा रहा है, खासकर उन मामलों में जहाँ संक्रमण ड्यूटी से जुड़ा हुआ हो।

