दिल्ली हाईकोर्ट ने संपत्ति और किरायेदारी कानूनों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ बेदखली और ‘मेसने प्रॉफिट’ (Mesne Profits) का आदेश दिया गया था, जो बिना किसी पुख्ता दस्तावेज के केवल एक मौखिक खरीद समझौते के आधार पर संपत्ति पर काबिज था।
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस शैल जैन की खंडपीठ ने अपील को खारिज करते हुए कानूनी सिद्धांत ‘nemo dat quod non habet’ (कोई भी व्यक्ति अपने पास मौजूद अधिकार से बेहतर अधिकार दूसरे को हस्तांतरित नहीं कर सकता) पर जोर दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि करोल बाग स्थित इस संपत्ति पर अपीलकर्ता का कब्जा पूरी तरह से अनधिकृत था।
मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले की शुरुआत वादी (प्रतिवादी संख्या 1) द्वारा दायर एक दीवानी मुकदमे से हुई थी। वादी ने दावा किया कि वह करोल बाग स्थित संपत्ति संख्या 13/31 का कानूनी मालिक है, जिसे उसने जून 2003 में एक पंजीकृत सेल डीड के माध्यम से खरीदा था। जून 2007 में यह संपत्ति ₹7,000 प्रति माह के किराये पर प्रतिवादी संख्या 1 को लीज पर दी गई थी।
वादी के अनुसार, प्रतिवादी संख्या 1 के बाद उसके परिवार के सदस्यों—बेटी (प्रतिवादी संख्या 2), दामाद (प्रतिवादी संख्या 3) और दामाद के भाई सन्मीत सिंह (अपीलकर्ता/प्रतिवादी संख्या 4)—ने इस पर कब्जा जारी रखा। वादी का आरोप था कि अप्रैल 2020 तक ₹12,000 की दर से किराया दिया गया, लेकिन उसके बाद भुगतान बंद कर दिया गया। जनवरी 2023 में कानूनी नोटिस के जरिए लीज समाप्त कर दी गई।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (सन्मीत सिंह): सन्मीत सिंह ने तर्क दिया कि वह किरायेदार नहीं है। उनका दावा था कि उन्होंने 2012 में वादी की सौतेली मां, श्रीमती बेला बोस के साथ ₹70 लाख में संपत्ति खरीदने का मौखिक समझौता किया था। उन्होंने दावा किया कि जनवरी 2022 तक पूरी राशि का भुगतान कर दिया गया था, लेकिन सेल डीड निष्पादित नहीं की गई। उन्होंने यह भी कहा कि वादी और उनके बीच कोई सीधा अनुबंध (Privity of Contract) नहीं है।
वादी (प्रतिवादी): वादी ने अपनी दलील में कहा कि संपत्ति मूल रूप से प्रतिवादी संख्या 1 को लीज पर दी गई थी और सन्मीत सिंह केवल उनके माध्यम से वहां रह रहे थे। वादी ने अदालत के समक्ष स्वामित्व के सभी पंजीकृत दस्तावेज और लीज समाप्ति का नोटिस प्रस्तुत किया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने पाया कि मूल किरायेदार यह साबित करने में विफल रहे कि उन्होंने लीज अवधि समाप्त होने के बाद कब्जा वादी को वापस कर दिया था। अपीलकर्ता के ₹70 लाख के भुगतान के दावे पर हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने टिप्पणी की:
“यह सामान्य विवेकपूर्ण व्यवहार के विपरीत है कि ₹70 लाख जैसी बड़ी राशि छह साल की अवधि में बिना किसी रसीद या पावती के भुगतान कर दी जाए। दस्तावेजी साक्ष्य के बिना ऐसा दावा खोखला प्रतीत होता है और अपीलकर्ता अपने इस दावे को साबित करने में विफल रहे हैं।”
अदालत ने यह भी गौर किया कि जब अपीलकर्ता ने श्रीमती बेला बोस को गवाह के रूप में पेश किया, तो उन्होंने भी उनका समर्थन नहीं किया और उन्हें ‘होस्टाइल’ (विरोधी गवाह) घोषित किया गया।
कानूनी सिद्धांत का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“एक खरीदार से यह अपेक्षा की जाती है कि वह इतनी बड़ी राशि का भुगतान करने से पहले विक्रेता के मालिकाना हक की जांच करे। साथ ही, बिना किसी औपचारिक रसीद के पूरी सेल कंसीडरेशन देना भी सामान्य आचरण नहीं है।”
कब्जे के संबंध में हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि अपीलकर्ता मूल किरायेदार के रिश्तेदार थे, इसलिए यह माना जाना चाहिए कि कब्जा उन्हें प्रतिवादी संख्या 1 के माध्यम से मिला था। लीज समाप्त होने के बाद उन्हें वहां रहने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने तीस हजारी कोर्ट (कमर्शियल कोर्ट) के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि अपीलकर्ता का कब्जा “पूरी तरह से अनधिकृत और कानूनन गलत” था।
अदालत ने ₹12,000 प्रति माह के मेसने प्रॉफिट और उसमें 10% वार्षिक वृद्धि के आदेश को भी उचित ठहराया। हाईकोर्ट ने कहा:
“यह एक स्थापित सिद्धांत है कि कानूनी हक के बिना कब्जा केवल अधिकार की एक परछाई मात्र है और यह वास्तविक मालिक के दावे के सामने टिक नहीं सकता।”
हाईकोर्ट ने इसी के साथ अपील और संबंधित सभी आवेदनों को खारिज कर दिया।
- केस का नाम: सन्मीत सिंह बनाम दिव्यांक बोस और अन्य (Sunmeet Singh vs. Divyank Bose & Ors.)
- केस संख्या: RFA(COMM) 109/2026

