सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि चश्मदीद गवाहों के बयान विश्वसनीय और सुसंगत हैं, तो केवल अपराध में प्रयुक्त हथियारों की बरामदगी न होना अभियोजन पक्ष के मामले को विफल नहीं करता है।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने झारखंड हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें दोहरे हत्याकांड के दोषियों की उम्रकैद की सजा की पुष्टि की गई थी। कोर्ट ने कहा कि जब प्रत्यक्षदर्शी गवाहों का साक्ष्य भरोसेमंद हो और चिकित्सा साक्ष्य उसकी पुष्टि करते हों, तो हथियार की बरामदगी अनिवार्य शर्त नहीं रह जाती।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 15 अगस्त 1985 का है। अभियोजन के अनुसार, घटना की शुरुआत सुबह 06:00 बजे हुई जब शिव प्रसाद मंडल की दो बकरियों ने बुलाकी मंडल की फसल चर ली थी। इसे लेकर दोनों पक्षों में विवाद हुआ और शिव प्रसाद ने बुलाकी को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी।
उसी दिन दोपहर लगभग 03:30 बजे, आरोपियों का एक समूह गड़ासा, तलवार, पिस्तौल, गुप्ती, फरसा, भाला और कुल्हाड़ी जैसे घातक हथियारों से लैस होकर बुलाकी मंडल के घर में घुस गया। हमलावरों ने बुलाकी और उनके भतीजे हृदय मंडल को घर से घसीटकर बाहर निकाला और उन पर तब तक हमला किया जब तक कि उनकी मौके पर ही मौत नहीं हो गई।
सत्र न्यायालय ने सभी आरोपियों को धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में झारखंड हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री अंजना प्रकाश ने दलील दी कि:
- अभियोजन के सभी गवाह मृतक के रिश्तेदार थे, इसलिए वे ‘हितबद्ध गवाह’ (interested witnesses) हैं।
- घटना के समय ग्रामीण मौजूद थे, लेकिन किसी भी स्वतंत्र गवाह का परीक्षण नहीं किया गया।
- हमले में प्रयुक्त हथियारों की बरामदगी नहीं हुई है, जो अभियोजन की कहानी पर संदेह पैदा करता है।
- आरोपियों से धारा 313 CrPC के तहत पूछे गए प्रश्न सामान्य प्रकृति के थे, जिससे उनके बचाव के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील श्री विष्णु शर्मा ने तर्क दिया कि चारों चश्मदीद गवाहों के बयान पूरी तरह सुसंगत हैं और पोस्टमार्टम रिपोर्ट चोटों के प्रकार और मृत्यु के कारणों की पुष्टि करती है।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
सुप्रीम कोर्ट ने चश्मदीद गवाहों के साक्ष्यों का विश्लेषण करने के बाद उन्हें विश्वसनीय पाया। हथियारों की बरामदगी के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा:
“किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए हमले के हथियार की बरामदगी ‘साइन क्वा नॉन’ (sine qua non – अनिवार्य शर्त) नहीं है।”
अदालत ने राकेश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2021) और ओम पाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि चश्मदीद गवाहों के बयान भरोसेमंद हैं, तो जांच अधिकारी की किसी चूक या हथियार की बरामदगी न होने से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता।
धारा 313 CrPC के तहत की गई पूछताछ पर कोर्ट ने फैनुल खान बनाम झारखंड राज्य (2019) का संदर्भ देते हुए कहा कि केवल प्रश्नों की सामान्य प्रकृति के आधार पर सजा को रद्द नहीं किया जा सकता, जब तक कि अपीलकर्ता यह साबित न कर दे कि इससे उसे वास्तविक ‘नुकसान’ (prejudice) पहुँचा है।
पीठ ने पाया कि आरोपियों को उनके खिलाफ लगे मुख्य आरोपों की जानकारी दी गई थी, इसलिए उनके पास अपनी बेगुनाही साबित करने का पर्याप्त अवसर था।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष ने संदेह से परे अपना मामला साबित किया है। चश्मदीद गवाहों के साक्ष्य और चिकित्सा साक्ष्य एक-दूसरे के पूरक हैं। कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए निचली अदालतों द्वारा दी गई सजा में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
- केस का शीर्षक: घनश्याम मंडल और अन्य बनाम बिहार राज्य (अब झारखंड)
- केस संख्या: आपराधिक अपील संख्या 3105/2025

