जंतर मंतर प्रदर्शन मामला: अलका लांबा की FIR रद्द करने की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस से मांगा जवाब

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को कांग्रेस नेता अलका लांबा द्वारा जंतर मंतर पर वर्ष 2024 में हुए प्रदर्शन से जुड़े मामले में दर्ज FIR, चार्जशीट तथा आरोप तय करने के आदेश को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर दिल्ली पुलिस से जवाब तलब किया। न्यायमूर्ति स्वरना कांता शर्मा ने नोटिस जारी कर पुलिस को अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई 3 सितंबर के लिए सूचीबद्ध की।

यह मामला 29 जुलाई 2024 को जंतर मंतर पर महिलाओं के आरक्षण के समर्थन में आयोजित प्रदर्शन से संबंधित है। अभियोजन का आरोप है कि लांबा ने प्रदर्शन के दौरान पुलिस कर्मियों को उनके कर्तव्य निर्वहन से रोका और सार्वजनिक मार्ग अवरुद्ध किया।

19 दिसंबर 2025 को मजिस्ट्रेट ने उनके खिलाफ आरोप तय करने का आदेश पारित किया था। आरोपों में लोक सेवक को कर्तव्य पालन से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल का प्रयोग, लोक सेवक के कार्य में बाधा, विधिवत जारी आदेश की अवज्ञा तथा सार्वजनिक मार्ग में अवरोध उत्पन्न करना शामिल है।

लांबा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर FIR, चार्जशीट और आरोप तय करने के आदेश सहित सभी कार्यवाहियों को रद्द करने की मांग की है। उनके अधिवक्ता अभिक चिमनी ने मामले को “शॉर्ट डेट” पर सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया ताकि कार्यवाही पर अंतरिम रोक की मांग की जा सके।

अदालत ने यह अनुरोध अस्वीकार करते हुए कहा, “FIR 2024 में दर्ज हुई थी। आप 2026 में आकर तात्कालिकता की बात कर रहे हैं।”

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याचिका में इस मामले को “शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अत्यधिक अपराधीकरण” बताया गया है। इसमें कहा गया है कि अभियोजन “मनमाना और चयनात्मक” है तथा किसी एक सार्वजनिक व्यक्ति के विरुद्ध बिना विश्वसनीय और विशिष्ट आरोपों के कार्रवाई की गई है, जिससे आपराधिक प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित होती है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि कार्यवाही जारी रहने से “गंभीर न्यायिक अन्याय” होगा क्योंकि याचिकाकर्ता को ऐसे आचरण के लिए आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ेगा जो संविधान द्वारा संरक्षित शांतिपूर्ण राजनीतिक अभिव्यक्ति और सभा की श्रेणी में आता है।

6 फरवरी को सत्र न्यायालय ने मजिस्ट्रेट के आरोप तय करने के आदेश को बरकरार रखा था। अदालत ने कहा था कि मजिस्ट्रेट ने अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग करते हुए प्रथम दृष्टया मामला पाया है।

स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति, चोट न होने तथा असहमति के स्वरूप से संबंधित दलीलों को सत्र न्यायालय ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि ये सभी तथ्य परीक्षण के दौरान साबित किए जाने वाले मुद्दे हैं और इस चरण पर इनका पूर्वनिर्णय नहीं किया जा सकता।

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सत्र न्यायालय ने मजिस्ट्रेट की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया जिसमें कहा गया था कि वीडियो साक्ष्य में लांबा पहली बैरिकेड कूदते हुए, महिलाओं की पुलिस श्रृंखला को धक्का देने के लिए प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व करते हुए, सार्वजनिक मार्ग पर लेटते हुए तथा दूसरी बैरिकेड पार करने के बाद टॉल्स्टॉय रोड की ओर जाते हुए दिखाई देती हैं।

अब हाईकोर्ट पुलिस के जवाब और पक्षकारों की दलीलों पर अगली सुनवाई में विचार करेगा।

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