इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने साल 2000 के एक बहुचर्चित हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाते हुए ओमकार मिश्रा की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति रजनीश कुमार और न्यायमूर्ति ज़फीर अहमद की खंडपीठ ने पाया कि अभियोजन पक्ष अपना मामला “संदेह से परे” साबित करने में विफल रहा। कोर्ट ने चश्मदीद गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास और शिकायतकर्ता द्वारा बोले गए झूठ को आधार बनाते हुए आरोपी को बरी करने का आदेश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला 20 मई 2000 का है। शिकायतकर्ता नवीन कुमार शुक्ला (मृतका के भाई) ने आरोप लगाया था कि उनकी बहन, जो एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं, को उनके पति ओमकार मिश्रा और उनके परिवार द्वारा दहेज (विशेष रूप से सुजुकी मोटरसाइकिल) के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था। एफआईआर के अनुसार, जब मृतका स्कूल से ‘ठेलिया’ (ट्राइसाइकिल लोडर) पर लौट रही थी, तब आरोपियों ने उसे तारा तालाब के पास रोका और करीब से गोली मार दी।
27 मार्च 2012 को, अपर सत्र न्यायाधीश, कोर्ट नंबर 3, सीतापुर ने ओमकार मिश्रा को आईपीसी की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने ‘अलीबी’ (घटना के समय कहीं और होने का प्रमाण) के आधार पर परिवार के अन्य सदस्यों, जैसे पिता, माता और भाइयों को बरी कर दिया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि दोषसिद्धि पूरी तरह से अविश्वसनीय सबूतों पर आधारित थी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कथित चश्मदीद गवाह (शिकायतकर्ता के चाचा) को कभी अदालत में पेश ही नहीं किया गया। इसके अलावा, न तो वह ठेलिया बरामद हुई, न ही छर्रे या हत्या में इस्तेमाल किया गया हथियार। बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि मृतका ने खुद अपनी मृत्यु से पहले दहेज उत्पीड़न के एक अन्य मामले (प्रदर्श ख-4) में सुजुकी मोटरसाइकिल की मांग का कोई जिक्र नहीं किया था।
वहीं, राज्य सरकार (एजीए) ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि चश्मदीद गवाहों ने अभियोजन के मामले को साबित किया है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मिली चोटें गवाहों के बयानों की पुष्टि करती हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने पी.डब्ल्यू.-1 (शिकायतकर्ता) और पी.डब्ल्यू.-2 (ठेलिया चालक) के बयानों की बारीकी से जांच की। बेंच ने पाया कि दूसरी गोली किसने चलाई, इस पर दोनों गवाहों के बयानों में गंभीर अंतर था। पी.डब्ल्यू.-1 ने इसका श्रेय आरोपी के भाई (सच्चिदानंद) को दिया, जबकि पी.डब्ल्यू.-2 ने पिता (हरि शंकर) को आरोपी बताया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि शिकायतकर्ता ने शपथ पर झूठ बोला कि उसके माता-पिता की मृत्यु हो चुकी है। हालांकि, पी.डब्ल्यू.-2 ने अदालत में स्वीकार किया कि शिकायतकर्ता के माता-पिता जीवित हैं और उसी के साथ रह रहे हैं। इस पर बेंच ने टिप्पणी की:
“एक ऐसा व्यक्ति, जो केवल अपने बहनोई को दोषी ठहराने के लिए अपने माता-पिता की मृत्यु का झूठा सहारा लेता है, उसकी गवाही पर गंभीर संदेह पैदा होता है… यदि कोई व्यक्ति शपथ पर यह कह सकता है कि उसके माता-पिता जीवित नहीं हैं, तो वह कुछ भी कर सकता है।”
दहेज की मांग के संबंध में, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि मोटरसाइकिल की मांग साबित नहीं हुई थी, क्योंकि अपीलकर्ता के पास पहले से ही स्कूटर था।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राम लक्ष्मण बनाम राजस्थान राज्य (2016) मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई गवाह पूरी तरह से अविश्वसनीय पाया जाता है, तो उसकी गवाही का उपयोग दोषसिद्धि के लिए नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त, योगरानी बनाम स्टेट (2024) का जिक्र करते हुए कोर्ट ने ‘समानता के सिद्धांत’ (Principle of Parity) पर जोर दिया:
“जब दो आरोपियों के खिलाफ एक ही तरह के सबूत हों और उन्हें एक जैसी भूमिका दी गई हो, तो कोर्ट एक को दोषी और दूसरे को बरी नहीं कर सकता।”
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष की कहानी “गंभीर संदेह” के घेरे में है, क्योंकि उन्हीं सबूतों के आधार पर अन्य आरोपियों को बरी कर दिया गया था, जबकि केवल अपीलकर्ता को दोषी ठहराया गया। बेंच ने माना कि ट्रायल कोर्ट का फैसला “संभावनाओं और अनुमानों” पर आधारित था, न कि ठोस सबूतों पर।
कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए ओमकार मिश्रा की दोषसिद्धि रद्द कर दी और उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
- केस का शीर्षक: ओमकार मिश्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
- अपील संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 546 वर्ष 2012

