सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि उत्तराखंड के हल्द्वानी में रेलवे भूमि पर रह रहे लोगों का उस जमीन पर कोई वैध अधिकार नहीं है और प्रस्तावित रेलवे विस्तार परियोजना के लिए उन्हें भूमि खाली करनी होगी। साथ ही, न्यायालय ने पात्र परिवारों के पुनर्वास के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के निर्देश दिए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि रेलवे भूमि पर अतिक्रमण को लेकर चल रहा गतिरोध अनंतकाल तक जारी नहीं रह सकता।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने स्पष्ट किया कि संबंधित भूमि रेलवे की है, यह विवादित नहीं है, और वहां रह रहे लोगों की मौजूदगी केवल प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण बनी रही।
पीठ ने कहा:
“यह सार्वजनिक भूमि है, यानी रेलवे भूमि है, इसमें कोई विवाद नहीं है। आप वहां केवल एक रियायत के तौर पर रह रहे हैं। इसे अधिकार के रूप में दावा नहीं कर सकते।”
याचिकाकर्ताओं की ओर से रेलवे परियोजना को स्थानांतरित करने या सीमित करने का आग्रह किया गया, लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि परियोजना से संबंधित तकनीकी निर्णय विशेषज्ञों के दायरे में आते हैं और न्यायालय ऐसे निर्देश नहीं दे सकता।
मानवीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने नैनीताल के जिलाधिकारी, हल्द्वानी के उप-जिलाधिकारी तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अधिकारियों को प्रभावित क्षेत्र में शिविर लगाने का निर्देश दिया, ताकि पात्र परिवारों को PMAY के आवेदन भरने में सहायता दी जा सके।
पीठ ने कहा कि यदि पात्र परिवारों के आवेदन 31 मार्च तक भर दिए जाएं तो न्यायालय इसकी सराहना करेगा। जिलाधिकारी और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश दिए गए। मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में होगी।
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि रेलवे विस्तार परियोजना आवश्यक है क्योंकि हल्द्वानी के बाद पहाड़ी क्षेत्र शुरू हो जाता है और पूर्व में नदी का पानी ट्रैक पर आने से नुकसान हुआ था।
उन्होंने कहा कि पात्र विस्थापित परिवारों को उत्तराखंड या उत्तर प्रदेश में PMAY के तहत आवास दिया जा सकता है तथा आवश्यकता होने पर छह महीने तक प्रति माह ₹2,000 की सहायता भी दी जा सकती है। 13 ऐसे निवासियों की पहचान की गई है जिनके पास फ्रीहोल्ड भूमि है और राज्य सरकार उनका अधिग्रहण करेगी।
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि कई परिवार पिछले चार-पांच दशकों से वहां रह रहे हैं और राज्य सरकार ने पहले क्षेत्र के नियमितीकरण का आश्वासन दिया था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि रेलवे को पूरी भूमि की आवश्यकता नहीं है।
वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने क्षेत्र में मौजूद धार्मिक स्थलों का मुद्दा उठाते हुए पुनर्वास के बाद ही विस्थापन की मांग की। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा:
“इन लोगों पर दया कीजिए। वे बिना पीने के पानी, बिजली और सीवरेज की व्यवस्था के अस्वच्छ परिस्थितियों में रह रहे हैं। उन्हें तय करने दीजिए कि वे PMAY के तहत घर लेना चाहते हैं या नहीं। कोई बाधा होगी तो न्यायालय देखेगा।”
यह विवाद हल्द्वानी में लगभग 29 एकड़ रेलवे भूमि से संबंधित है, जहां 4,000 से अधिक परिवार और करीब 50,000 लोग रह रहे हैं। रेलवे के अनुसार वहां 4,365 अतिक्रमणकारी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी 2023 को उत्तराखंड हाईकोर्ट के तत्काल बेदखली के आदेश पर रोक लगाते हुए इसे “मानवीय मुद्दा” बताया था और कहा था कि इतने बड़े पैमाने पर लोगों को एक साथ बेघर नहीं किया जा सकता।
इसके बाद 24 जुलाई 2024 को शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को पुनर्वास योजना तैयार करने और रेलवे परियोजना के लिए आवश्यक भूमि की पहचान करने के निर्देश दिए थे।
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पहले रेलवे और जिला प्रशासन को एक सप्ताह का नोटिस देकर अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अतिक्रमणकारियों का भूमि पर कोई कानूनी अधिकार नहीं है, लेकिन पात्र परिवारों के पुनर्वास को प्राथमिकता देते हुए PMAY के माध्यम से समयबद्ध प्रक्रिया अपनाने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में होगी।

