सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पसमांदा मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के तहत नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण देने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुस्लिम समुदाय के भीतर पिछड़े वर्गों का विस्तृत आंकड़ा मांगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अंजना प्रकाश से पूछा कि क्या केवल पसमांदा मुसलमान ही सांख्यिकीय रूप से पिछड़े हैं या अन्य मुस्लिम ओबीसी समुदाय भी मौजूद हैं।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि ओबीसी की पहचान केवल सामाजिक स्थिति से नहीं, बल्कि आर्थिक कारकों से भी जुड़ी होती है। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या याचिका में यह अध्ययन किया गया है कि कुल कितने मुसलमान वास्तव में पिछड़े वर्ग में आते हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने यह चिंता जताई कि यदि केवल पसमांदा मुसलमानों को लाभ दिया जाता है तो अन्य गरीब और पिछड़े मुसलमानों के साथ अन्याय हो सकता है। पीठ ने कहा कि अदालत को यह देखना होगा कि क्या पसमांदा ही एकमात्र सांख्यिकीय रूप से पिछड़ा वर्ग है।
याचिका में रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ओबीसी के भीतर उप-वर्गीकरण कर पसमांदा मुसलमानों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की मांग की गई है।
सुनवाई की शुरुआत में याचिकाकर्ता की ओर से यह भी अनुरोध किया गया कि इस याचिका को आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को 4 प्रतिशत आरक्षण देने के मुद्दे से संबंधित लंबित मामले के साथ टैग किया जाए।
अदालत को बताया गया कि आंध्र प्रदेश सरकार की अपील पर संविधान पीठ विचार कर रही है। यह अपील उस 2005 के आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ है, जिसमें मुसलमानों को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने वाले राज्य कानून को रद्द कर दिया गया था।
वरिष्ठ अधिवक्ता अंजना प्रकाश ने पीठ के प्रश्नों का जवाब देने के लिए समय मांगा। पीठ ने मामले को चार सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

