कलकत्ता हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत चल रही एक आपराधिक कार्यवाही को आंशिक रूप से रद्द कर दिया है। अदालत ने “पद-आधारित संलिप्तता” (status-based implication) और “अधिनियम-आधारित उत्तरदायित्व” (act-based liability) के बीच अंतर स्पष्ट किया। जस्टिस उदय कुमार ने पति के भाई (देवर) के खिलाफ कार्यवाही को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि उनके खिलाफ आरोप अस्पष्ट थे, जबकि पति के खिलाफ मुकदमा जारी रखने का निर्देश दिया क्योंकि उनके विरुद्ध विशिष्ट “ठोस तथ्य” और “प्रत्यक्ष कृत्य” के आरोप मौजूद हैं।
यह मामला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528) के तहत पति आशीष कुमार दत्ता और देवर तापस कुमार दत्ता द्वारा दायर किया गया था। याचिकाकर्ताओं ने हावड़ा की अदालत में लंबित जी.आर. केस नंबर 1883/2017 को रद्द करने की मांग की थी, जो दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं और आईपीसी की धारा 498A (क्रूरता), 406 (विश्वासघात), 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज किया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि और तथ्य
याचिकाकर्ता नंबर 1, आशीष कुमार दत्ता (एक वकील) और विपक्षी पक्ष नंबर 2, कस्तूरी दत्ता का विवाह 28 नवंबर 2005 को हुआ था। शादी के लगभग 12 साल बाद 30 मार्च 2017 को पत्नी ने ससुराल छोड़ दिया। पत्नी का आरोप था कि शादी के तुरंत बाद से ही उसे दहेज के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उसने दावा किया कि 30 मार्च 2017 को उसे तब पीटा गया और घर से निकाला गया जब उसके पिता ने गाड़ी खरीदने के लिए ₹1,00,000 देने में असमर्थता जताई।
इसके विपरीत, पति का तर्क था कि पत्नी ने स्वेच्छा से घर छोड़ा है। उसने पत्नी के पिता द्वारा उसी दिन हस्ताक्षरित एक “नो-कंप्लेंट” घोषणा पत्र पर भरोसा जताया, जिसमें कहा गया था कि उन्हें ससुराल वालों से कोई शिकायत नहीं है।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ताओं की ओर से: वकील अरित्र भट्टाचार्य ने तर्क दिया कि पत्नी की एफआईआर पति द्वारा दायर दाम्पत्य अधिकारों की बहाली (Restitution of Conjugal Rights) के मुकदमे के जवाब में किया गया एक “काउंटर-ब्लास्ट” है। उन्होंने स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल (1992) का हवाला देते हुए कहा कि आरोप “बेतुके और अंतर्निहित रूप से असंभव” हैं। देवर के संदर्भ में, उन्होंने कहकशां कौसर उर्फ सोनम बनाम बिहार राज्य (2022) पर भरोसा करते हुए कहा कि आरोप “अस्पष्ट और सर्वव्यापी” (vague and omnibus) हैं।
राज्य और विपक्षी पक्ष की ओर से: श्री बिताशोक बनर्जी ने तर्क दिया कि चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, इसलिए हाईकोर्ट को “मिनी-ट्रायल” नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि “नो-कंप्लेंट” पत्र की सत्यता और अन्य आरोप ट्रायल का विषय हैं जिन्हें गवाही के माध्यम से परखा जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में परिवार के सभी सदस्यों को घसीटने की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की। जस्टिस कुमार ने टिप्पणी की:
“यह सामान्य अनुभव की बात है कि धारा 498-A IPC के तहत इनमें से अधिकांश शिकायतें क्षणिक आवेश में मामूली मुद्दों पर दर्ज की जाती हैं… अक्सर शिकायत के आरोप पति के पूरे परिवार को शामिल करने के दृष्टिकोण से लगाए जाते हैं।”
अदालत ने ‘फिल्टर थ्योरी’ का उल्लेख करते हुए कहा कि आपराधिक दायित्व व्यक्तिगत होना चाहिए।
देवर (याचिकाकर्ता नंबर 2) के संबंध में: अदालत ने पाया कि देवर के खिलाफ “नियमित रूप से शराब पीकर गाली-गलौज करने” के आरोप में किसी विशिष्ट तारीख, समय या क्रूरता के प्रत्यक्ष कृत्य का अभाव था। कहकशां कौसर मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“आरोपियों के खिलाफ किसी विशिष्ट भूमिका के अभाव में, यह अन्यायपूर्ण होगा यदि उन्हें ट्रायल की कठिनाइयों से गुजरने के लिए मजबूर किया जाए।”
पति (याचिकाकर्ता नंबर 1) के संबंध में: पति के मामले में कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता ने “ठोस तथ्य” पेश किए हैं, विशेष रूप से ₹1,00,000 की मांग और 30 मार्च 2017 को घर से निकाले जाने की घटना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि पति के पास “नो-कंप्लेंट” पत्र जैसा एक प्रभावी बचाव का हथियार है, लेकिन इसकी सत्यता ट्रायल के दौरान ही जांची जा सकती है।
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने रिविजनल एप्लीकेशन को आंशिक रूप से स्वीकार किया। तापस कुमार दत्ता (देवर) के खिलाफ कार्यवाही को रद्द कर दिया गया और उन्हें उनके बेल बॉन्ड से मुक्त कर दिया गया। हालांकि, आशीष कुमार दत्ता (पति) के खिलाफ कार्यवाही रद्द करने की प्रार्थना को खारिज कर दिया गया। ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह पति के खिलाफ कानून के अनुसार शीघ्रता से कार्यवाही को आगे बढ़ाए।
- केस का नाम: आशीष कुमार दत्ता एवं अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य
- केस संख्या: CRR 882 of 2022

