दिल्ली हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत शादी का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाने के आरोपी एक व्यक्ति की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि आरोपी द्वारा बाद में जन्मपत्री (कुंडली) न मिलने का हवाला देकर शादी से इनकार करना, उसके उन पूर्व आश्वासनों के बिल्कुल विपरीत है, जिनमें उसने पीड़िता से कहा था कि उनकी कुंडलियां पहले ही मिल चुकी हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 27 वर्षीय महिला की शिकायत पर पुलिस स्टेशन केशव पुरम में दर्ज एफआईआर (FIR) संख्या 01/2026 से संबंधित है। महिला ने जयंत वत्स (आवेदक) पर यौन शोषण और छल का आरोप लगाया है, जिसे वह वर्ष 2018 से जानती थी। अभियोक्त्री के अनुसार, विवाह के आश्वासन पर जुलाई 2019 से कई बार शारीरिक संबंध बनाए गए। उसने आरोप लगाया कि बाद में आवेदक ने यह कहते हुए शादी से इनकार कर दिया कि उसका परिवार ज्योतिष में गहरी आस्था रखता है और उनकी कुंडलियां आपस में नहीं मिलती हैं।
अभियोक्त्री ने इससे पहले नवंबर 2025 में एक लिखित शिकायत दी थी, जिसे उसने आवेदक और उसके परिवार द्वारा विवाह संपन्न कराने के आश्वासन के बाद वापस ले लिया था। इस आश्वासन के पूरा न होने पर उसने यह नई शिकायत दर्ज कराई।
पक्षों की दलीलें
आवेदक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्री संदीप शर्मा ने तर्क दिया कि आवेदक को झूठे मामले में फंसाया गया है और वह 4 जनवरी 2026 से न्यायिक हिरासत में है। उन्होंने दलील दी कि यह संबंध सहमति से बना था, दोनों पक्ष आठ साल से एक-दूसरे को जानते थे और आवेदक वास्तव में शिकायतकर्ता से शादी करना चाहता था। उन्होंने यह तर्क देते हुए जमानत मांगी कि केवल कुंडली न मिलने के कारण शादी नहीं हो सकी और न्यायिक दृष्टांतों (precedents) का हवाला दिया कि सहमति से बने रिश्ते के विफल होने पर बलात्कार का अपराध नहीं बनता।
इसके विपरीत, राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) श्री नरेश कुमार चाहर और अभियोक्त्री के वकील ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने प्रस्तुत किया कि व्हाट्सएप चैट से स्पष्ट होता है कि आवेदक ने शिकायतकर्ता को बार-बार आश्वासन दिया था कि उनकी कुंडलियां मिल गई हैं और उनकी शादी में कोई बाधा नहीं है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि आवेदक ने चैट में स्वयं यह स्वीकार किया था कि शिकायतकर्ता शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने के लिए अनिच्छुक थी और वह केवल उसके लगातार दबाव के कारण सहमत हुई थी।
कोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने इस बात पर गौर किया कि व्हाट्सएप चैट और BNSS की धारा 183 के तहत अभियोक्त्री के बयान सहित रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया यह दर्शाती है कि आवेदक ने अभियोक्त्री को बार-बार शादी का आश्वासन दिया था। कोर्ट ने पाया कि आवेदक ने कुंडली मिलान के लिए जन्म का विवरण मांगा था और 14 सितंबर, 2023 की एक चैट में कहा था, “कल ही शादी कर रहे हैं हम,” जो यह प्रदर्शित करता है कि कुंडली के मुद्दे को पहले ही सुलझा हुआ बताया गया था।
कुंडली न मिलने की बचाव पक्ष की दलील को खारिज करते हुए, कोर्ट ने कहा, “यदि कुंडली मिलान का मुद्दा वास्तव में आवेदक और उसके परिवार के लिए इतना अधिक महत्वपूर्ण था, तो शारीरिक संबंध बनाने से पहले ही शुरुआत में इसे सुलझा लिया जाना चाहिए था।“
कोर्ट ने उन मामलों के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया जहां कोई वास्तविक वादा बाद की परिस्थितियों के कारण पूरा नहीं हो पाता है, और जहां सहमति प्राप्त करने के लिए शुरुआत से ही झूठा आश्वासन दिया जाता है।
न्यायाधीश ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“इसके विपरीत पूर्व आश्वासनों के बावजूद, कुंडली न मिलने के आधार पर बाद में शादी से इनकार करना, प्रथम दृष्टया आवेदक द्वारा किए गए वादे की प्रकृति और वास्तविकता पर सवाल उठाता है। इस स्तर पर इस तरह का आचरण, बीएनएस (BNS) की धारा 69 के तहत अपराध की श्रेणी में आएगा, जो विशेष रूप से धोखे या शादी के झूठे आश्वासन से प्रेरित यौन संबंधों के मामलों से संबंधित है।“
निर्णय
इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि जांच अभी एक महत्वपूर्ण चरण में है और मामले में आरोप पत्र (चार्जेसशीट) दाखिल किया जाना शेष है, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर आवेदक को नियमित जमानत देने के पक्ष में नहीं है। तदनुसार, जमानत याचिका खारिज कर दी गई। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फैसले में की गई टिप्पणियां केवल जमानत याचिका के निपटारे के लिए हैं और इन्हें मामले के गुण-दोष पर अदालत की राय नहीं माना जाना चाहिए।
केस विवरण
- केस का शीर्षक: जयंत वत्स बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली)
- केस नंबर: बेल एप्लीकेशन (BAIL APPLN.) 422/2026

