इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ खंडपीठ) ने अफीम की बरामदगी से जुड़े एक मामले में दो व्यक्तियों, कमलेश और मुन्ना की सजा को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करने में विफल रहा, विशेष रूप से एनडीपीएस एक्ट की धारा 50 के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन और फोरेंसिक रिपोर्ट आने से पहले ही आरोप पत्र दाखिल करना जांच पर गंभीर सवाल उठाता है।
न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव ने अपीलों को स्वीकार करते हुए टिप्पणी की कि धारा 50 का पालन केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह आरोपी को दिया गया एक महत्वपूर्ण वैधानिक संरक्षण है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 17 जनवरी 2000 का है, जब बाराबंकी के कोठी थाने की पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर ग्राम बीरापुर के पास छापेमारी की थी। पुलिस के अनुसार, वहां तीन व्यक्ति—कमलेश, मुन्ना और परीदीन—अफीम खरीदते हुए पकड़े गए थे।
अभियोजन का दावा था कि तलाशी के दौरान कमलेश की कमर में बंधे अंगोछे (तौलिये) से 500 ग्राम अफीम, मुन्ना की कांख (armpit) के नीचे दबे पॉलीथीन से 1 किलोग्राम और परीदीन के हाथ से 400 ग्राम अफीम बरामद हुई थी। 21 अगस्त 2007 को ट्रायल कोर्ट ने कमलेश और मुन्ना को धारा 8/18 एनडीपीएस एक्ट के तहत दोषी करार दिया था। अपील लंबित रहने के दौरान तीसरे आरोपी परीदीन की मृत्यु हो गई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि धारा 50 के तहत आरोपी को मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) के सामने तलाशी देने का अधिकार है, जिसे पुलिस ने स्पष्ट रूप से नहीं बताया। साथ ही, यह भी मुद्दा उठाया गया कि 20 जनवरी 2000 को नमूने रासायनिक परीक्षण के लिए भेजे गए और अगले ही दिन 21 जनवरी को फोरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार किए बिना आरोप पत्र (Charge Sheet) दाखिल कर दिया गया।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि बरामदगी पॉलीथीन बैग से हुई थी, जो ‘व्यक्तिगत तलाशी’ की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए धारा 50 लागू नहीं होती।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने इस मामले में दो मुख्य बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया:
1. धारा 50 की अनिवार्यता हाईकोर्ट ने पाया कि कमलेश के मामले में अफीम उसकी कमर में बंधे अंगोछे से बरामद हुई थी, जो उसके पहनावे का अभिन्न अंग है। स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश बनाम पवन कुमार (2005) का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने इसे ‘व्यक्तिगत तलाशी’ माना।
तीनों आरोपियों को एक साथ (Joint Option) तलाशी का विकल्प देने पर हाईकोर्ट ने कहा:
“हमारी राय में, आरोपी को एनडीपीएस अधिनियम की धारा 50(1) के तहत उपलब्ध अधिकार की संयुक्त सूचना देना धारा 50 के वास्तविक उद्देश्य को विफल कर देता है… इस अधिकार की सूचना स्पष्ट, असंदिग्ध और व्यक्तिगत होनी चाहिए।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस ने केवल एक ‘विकल्प’ दिया था, जबकि उन्हें आरोपी को उसके ‘वैधानिक अधिकार’ के बारे में बताना चाहिए था।
2. जांच में खामियां हाईकोर्ट ने जांच के “लापरवाह और यांत्रिक” (casual and mechanical) तरीके पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा:
“आरोप पत्र को इतनी जल्दबाजी में दाखिल करना, वह भी तब जब संदिग्ध पदार्थ की प्रकृति का पता लगाने वाली फोरेंसिक रिपोर्ट तक नहीं आई थी, पूरी जांच को संदिग्ध बनाता है। एनडीपीएस मामलों में पदार्थ की प्रकृति ही बुनियादी तत्व है।”
इसके अलावा, जब्त किए गए नमूनों पर आरोपियों के हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान न होना और गांव में गिरफ्तारी के बावजूद किसी स्वतंत्र गवाह का न होना भी अभियोजन के मामले को कमजोर कर गया।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इन सभी खामियों के संचयी प्रभाव (cumulative effect) के कारण अभियोजन की कहानी पर गहरा संदेह उत्पन्न होता है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट इन स्पष्ट खामियों पर ध्यान देने में विफल रहा।
अदालत ने 21 अगस्त 2007 के सजा के आदेश को रद्द करते हुए कमलेश और मुन्ना को धारा 8/18 एनडीपीएस एक्ट के आरोपों से बरी कर दिया।
- केस : मुन्ना बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (क्रिमिनल अपील संख्या 1937/2007) एवं कमलेश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (क्रिमिनल अपील संख्या 1992/2007)

