पत्नी की हत्या के दोषी पति को उसकी संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलेगा: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट किया है कि एक व्यक्ति जिसने जानबूझकर किसी की हत्या की है, वह मृतक की संपत्ति विरासत में पाने का हकदार नहीं हो सकता। हाईकोर्ट ने ‘स्लेयर रूल’ (Slayer Rule) के सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि भले ही भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 में हत्यारे को अयोग्य घोषित करने का कोई विशिष्ट प्रावधान न हो, लेकिन सार्वजनिक नीति (Public Policy) और न्याय के सिद्धांतों के आधार पर अपराधी को अपने ही अपराध का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

यह निर्णय न्यायमूर्ति ईश्वरन एस. की एकल पीठ ने विजयन बनाम अप्पुकुट्टा (RSA No. 463 of 2011) के मामले में सुनाया। अदालत ने निचली अदालतों के उन फैसलों को पलट दिया जिनमें केवल इसलिए राहत देने से मना कर दिया गया था क्योंकि कानून की किताब में इस संबंध में कोई स्पष्ट धारा मौजूद नहीं थी।

मामले की विस्तृत पृष्ठभूमि

मामले के अनुसार, वादी की बेटी वत्सला और प्रतिवादी अप्पुकुट्टा का विवाह 1996 में ईसाई रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। विवाह से पहले, वादी ने अपनी बेटी और दामाद के पक्ष में ‘स्त्रीधन’ के रूप में 20 सेंट भूमि का एक सेटलमेंट डीड निष्पादित किया था। हालांकि, प्रतिवादी दहेज की मांग से संतुष्ट नहीं था। जमीन के बाद उसने नकदी की मांग की, जिसके कारण जमीन बेचकर ₹75,000 की राशि जुटाई गई और इसे इंडियन ओवरसीज बैंक में दोनों के संयुक्त नाम पर फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के रूप में रखा गया।

शादी के कुछ ही महीनों बाद, 25 मई 1997 को प्रतिवादी ने अपनी पत्नी की हत्या कर दी। प्रतिवादी को आईपीसी की धारा 498A और 304B (दहेज हत्या) के तहत दोषी ठहराया गया और सजा सुनाई गई। पत्नी की मृत्यु के बाद, उसकी मां ने यह दावा करते हुए मुकदमा दायर किया कि वही एकमात्र कानूनी उत्तराधिकारी है और हत्यारे पति को संपत्ति या FD की राशि पर कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।

निचली अदालतों का ‘सीमित’ दृष्टिकोण

ट्रायल कोर्ट और पहली अपीलीय अदालत ने वादी के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि पक्षकार भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के तहत शासित होते हैं। अदालतों का तर्क था कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 25 में तो हत्यारे को विरासत से वंचित करने का प्रावधान है, लेकिन भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम में ऐसी कोई धारा नहीं है। इस तकनीकी आधार पर, उन्होंने हत्यारे पति को उसकी पत्नी की संपत्ति से बेदखल करने से इनकार कर दिया था।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और ‘स्लेयर रूल’ का सिद्धांत

न्यायमूर्ति ईश्वरन एस. ने इस मामले में गहन कानूनी विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि जब कानून किसी विशेष परिस्थिति पर मौन हो, तो अदालत को ‘न्याय, साम्य और शुद्ध अंतःकरण’ (Justice, Equity and Good Conscience) के सिद्धांतों का सहारा लेना चाहिए।

अदालत ने ‘स्लेयर रूल’ (Slayer Rule) का विस्तार से उल्लेख किया, जो अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम (जहाँ इसे ‘Forfeiture Rule’ कहा जाता है) की कानूनी प्रणालियों से उभरा है। हाईकोर्ट ने कहा:

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“स्लेयर रूल के कॉमन लॉ सिद्धांत के तहत, वह व्यक्ति जो जानबूझकर किसी की हत्या करता है, वह पीड़ित की संपत्ति प्राप्त करने या विरासत पाने से अयोग्य हो जाता है। यह सिद्धांत इस सार्वजनिक नीति पर आधारित है कि किसी को भी अपने ही अपराध से लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।”

अदालत ने कई अंतरराष्ट्रीय और भारतीय मिसालों का हवाला दिया:

  1. म्यूचुअल लाइफ बनाम आर्मस्ट्रांग (1886): जिसमें अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह न्यायशास्त्र पर एक कलंक होगा यदि कोई उस व्यक्ति की बीमा पॉलिसी की राशि प्राप्त कर सके जिसकी उसने हत्या की है।
  2. रिग्स बनाम पामर (1889): जिसने ‘स्लेयर रूल’ को और मजबूती से स्थापित किया।
  3. गिरिमल्लप्पा चन्नप्पा सोमसागर बनाम केंचावा (1921): जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट और प्रिवी काउंसिल ने भी माना था कि हत्यारे को विरासत से वंचित करना सार्वजनिक नीति का हिस्सा है।
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“सामाजिक नैतिकता को नष्ट नहीं कर सकते”

अदालत ने निचली अदालतों के दृष्टिकोण को ‘प्रतिगामी’ (Pedantic) बताया और कहा कि कानून का उद्देश्य सामाजिक नैतिकता की रक्षा करना है। न्यायमूर्ति ईश्वरन ने स्पष्ट किया:

“अदालतें ऐसा कोई दृष्टिकोण नहीं अपना सकतीं जो सामाजिक नैतिकता को नष्ट करता हो। चूंकि यह निर्विवाद है कि प्रतिवादी अपनी पत्नी की हत्या का दोषी है, इसलिए उसे उसकी संपत्ति विरासत में मिलने का कोई अधिकार नहीं है।”

हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय

हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालतों के आदेशों को रद्द कर दिया। अदालत ने घोषणा की कि प्रतिवादी को उसकी पत्नी की संपत्ति (FD और अन्य संपत्ति) विरासत में पाने से अयोग्य माना जाता है। वादी (मां और उसके कानूनी उत्तराधिकारी) अब बैंक से फिक्स्ड डिपॉजिट की राशि प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र हैं।

केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: विजयन और अन्य बनाम अप्पुकुट्टा
  • केस संख्या: आर.एस.ए. संख्या 463/2011

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