एमटीपी एसओपी होने के बावजूद रेप पीड़िताएं कोर्ट आ रही हैं, क्रियान्वयन में खामियां: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से मांगा हलफनामा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि 24 सप्ताह तक गर्भसमापन के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) मौजूद होने के बावजूद रेप पीड़िताएं देर से गर्भावस्था का पता चलने और कानूनी प्रक्रिया की जानकारी के अभाव के कारण अदालतों का दरवाजा खटखटा रही हैं, जो एसओपी के क्रियान्वयन में खामियों को दर्शाता है। कोर्ट ने इस संबंध में उत्तर प्रदेश सरकार से विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है।

न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने 6 फरवरी को एक नाबालिग रेप पीड़िता की गर्भसमापन याचिका से उत्पन्न स्वतः संज्ञान जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।

पीठ ने कहा कि कानून के अनुसार 20 सप्ताह तक और विशेष परिस्थितियों में 24 सप्ताह तक गर्भसमापन की अनुमति है, लेकिन कई मामलों में पीड़िताओं को गर्भ का पता देर से चलता है। कोर्ट ने कहा:

“चूंकि कानून ऐसे गर्भ को 20 सप्ताह तक और 24 सप्ताह से अधिक नहीं समाप्त करने की अनुमति देता है, रेप पीड़िताओं को अक्सर गर्भावस्था की जानकारी देर से होती है और कभी-कभी कानून और प्रक्रिया की समझ के अभाव में पीड़िता और उसके परिवार का कीमती समय नष्ट हो जाता है।”

कोर्ट ने माना कि राज्य ने कानून के अनुरूप एसओपी बनाई है, जिससे उसकी अनुपालन की इच्छा स्पष्ट होती है, लेकिन इसके बावजूद गर्भसमापन के लिए व्यक्तियों का अदालत आना यह दर्शाता है कि उनके क्रियान्वयन में कमियां हैं।

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पीठ ने प्रमुख सचिव, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, उत्तर प्रदेश से महिला एवं बाल स्वास्थ्य से संबंधित व्यवस्थाओं पर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा कि नोडल प्राधिकरण, विशेषज्ञ काउंसलर और अन्य एजेंसियों के समन्वय से एक संस्थागत तंत्र बनाया जाना चाहिए, जो पीड़िता और उसके परिवार को उपलब्ध विकल्पों के बारे में मार्गदर्शन दे सके। कोर्ट ने कहा:

“जब तक नोडल प्राधिकरण अन्य पेशेवरों, अधिकारियों और एजेंसियों जैसे विशेषज्ञ काउंसलर के साथ उपलब्ध नहीं कराए जाते, जो पीड़िता और उसके परिवार को गर्भसमापन आदि के विकल्पों पर परामर्श दे सकें, तब तक राज्य की ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण नागरिकों की देखभाल की इच्छा अधूरी रह सकती है।”

पीठ ने कहा कि 24 सप्ताह की सीमा पार होने से बचाने के लिए शुरुआती चरण में गर्भ परीक्षण की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि पीड़िता समय रहते गर्भ रखने या समाप्त करने का निर्णय ले सके।

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कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य के पास ऐसे मामलों के लिए योजनाएं होनी चाहिए जहां पीड़िता गर्भ को पूर्ण अवधि तक रखना चाहती हो, और ऐसे मामलों के लिए भी व्यवस्था हो जहां बच्चे को दत्तक दिया जाना हो।

पीठ ने रेप पीड़िताओं को मुआवजा देने और आपराधिक मुकदमे के लिए भ्रूण के संरक्षण की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

मामले की अगली सुनवाई 13 मार्च को निर्धारित की गई है।

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