को-ऑर्डिनेट बेंच के फैसले को रिट याचिका के जरिए चुनौती नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता की याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अधिवक्ता मैथ्यूज जे. नेदुम्परा द्वारा दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपनी ही अदालत की एक को-ऑर्डिनेट बेंच (समान पीठ) द्वारा मार्च 2019 में दिए गए अवमानना के फैसले को चुनौती दी थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह याचिका विचारणीय (maintainable) नहीं है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच के आदेश को रिट याचिका के माध्यम से उसी अदालत की दूसरी समान पीठ के समक्ष चुनौती नहीं दी जा सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद 12 मार्च, 2019 के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता मैथ्यूज जे. नेदुम्परा को अदालत की अवमानना का दोषी पाया था। अवमानना की कार्यवाही उस समय शुरू हुई थी जब पीठ एक संगठन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसका प्रतिनिधित्व नेदुम्परा कर रहे थे। सजा के अपने अंतिम आदेश में, शीर्ष अदालत ने उन्हें तीन महीने के कारावास की सजा सुनाई थी, लेकिन उनके द्वारा बिना शर्त माफी मांगे जाने के बाद सजा को निलंबित कर दिया गया था। इसके साथ ही, अदालत ने उन्हें एक वर्ष के लिए सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने से प्रतिबंधित कर दिया था। जेल की सजा का निलंबन इस शर्त पर था कि वे भविष्य में कभी भी सुप्रीम कोर्ट या बॉम्बे हाईकोर्ट के जजों को डराने-धमकाने (browbeat) का प्रयास नहीं करेंगे।

नेदुम्परा ने अब एक रिट याचिका दायर कर 2019 के उसी अवमानना दोषसिद्धि के फैसले को मेरिट के आधार पर चुनौती दी थी।

याचिका की विचारणीयता पर बहस

सुनवाई के दौरान, पीठ ने याचिका के कानूनी आधार पर कड़े सवाल उठाए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्वयं पेश हुए नेदुम्परा से पूछा:

“कानून के किस प्रावधान के तहत हम को-ऑर्डिनेट बेंच के आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका पर सुनवाई कर सकते हैं?”

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नेदुम्परा ने तर्क दिया कि पिछले फैसले में हुई “गलती को सुधारना” अदालत का कर्तव्य है। हालांकि, पीठ इस प्रक्रियात्मक बाधा पर अडिग रही। जब नेदुम्परा ने दावा किया कि उन्होंने समीक्षा याचिका (review petition) दायर की थी, लेकिन “इस अदालत से रिकॉर्ड गायब है,” तो मुख्य न्यायाधीश ने इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई।

सीजेआई ने टिप्पणी की:

“रिकॉर्ड गायब होने जैसे अपमानजनक आरोप न लगाएं। क्या आपने सीजेआई से इस बात की शिकायत की थी कि रिकॉर्ड गायब है?”

अदालत का विश्लेषण और निर्णय

पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई कानूनी प्रावधान बताने में विफल रहा जिसके तहत उसी अदालत की समान शक्ति वाली पीठ के फैसले के खिलाफ रिट याचिका दायर की जा सके। अदालत ने उल्लेख किया कि एक बार जब याचिका विचारणीय नहीं पाई जाती, तो यह एक प्रकार का ‘प्रतिबंध’ (embargo) होता है जो अदालत को मामले के गुण-दोष (merits) में जाने से रोकता है।

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अदालत ने दोहराया कि किसी फैसले के खिलाफ कानूनी उपचार आमतौर पर पुनर्विचार याचिका (Review) या उसके बाद उपचारात्मक याचिका (Curative) होती है, न कि एक नई रिट याचिका।

याचिका को खारिज करते हुए पीठ ने दर्ज किया कि याचिकाकर्ता यह समझाने में असमर्थ था कि कानून के तहत यह रिट याचिका कैसे विचारणीय थी। परिणामस्वरूप, 2019 की अवमानना दोषसिद्धि और उससे जुड़ी शर्तें बरकरार रहेंगी।

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