नाबालिग की ‘सहमति’ का कानूनी मूल्य न होने पर भी ‘प्रेम संबंध’ और ‘बौद्धिक क्षमता’ जमानत के लिए अहम आधार: दिल्ली हाईकोर्ट ने POCSO मामले में जमानत दी

पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के कड़े प्रावधानों के बीच दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए बलात्कार के आरोपी प्रेमी को नियमित जमानत दे दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही कानून की नजर में नाबालिग की सहमति का कोई मूल्य नहीं है, लेकिन अगर मामला प्रथम दृष्टया ‘प्रेम प्रसंग’ (Romantic Relationship) का लगता है और पीड़िता की उम्र बालिग होने के करीब है, तो उसकी “बौद्धिक क्षमता” (Intellectual Capacity) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

जस्टिस विकास महाजन की पीठ ने यह फैसला सुनाया, जिससे उन मामलों में नई उम्मीद जगी है जहां किशोर उम्र के प्रेम प्रसंगों को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा जाता है।

क्या था पूरा मामला?

घटना की शुरुआत 12 अगस्त 2023 को हुई, जब राजेंद्र नगर थाने में आईपीसी की धारा 363/366A/376 और पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के तहत एफआईआर दर्ज की गई। शिकायतकर्ता पिता ने आरोप लगाया कि उनकी बेटी, जिसकी उम्र लगभग साढ़े 14 साल बताई गई थी, लापता हो गई है।

पुलिस जांच के दौरान, 18 अगस्त 2023 को पीड़िता और आरोपी (याचिकाकर्ता) को आगरा के एक होटल से बरामद किया गया। दिल्ली लाने के बाद सीआरपीसी की धारा 164 के तहत पीड़िता का बयान दर्ज किया गया और 20 अगस्त 2023 को आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया। तब से वह न्यायिक हिरासत में था।

उम्र का पेंच और मेडिकल टेस्ट

इस केस में पीड़िता की उम्र का निर्धारण एक बड़ी चुनौती थी क्योंकि उसका कोई स्कूल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। 21 सितंबर 2023 को कराए गए बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट (Bone Ossification Test) में उसकी उम्र “14 साल से अधिक लेकिन 17 साल से कम” आंकी गई।

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इस पर हाईकोर्ट ने कोर्ट ऑन इट्स ओन मोशन बनाम स्टेट (2024) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में मेडिकल टेस्ट की ‘ऊपरी सीमा’ (Upper Age Limit) को ही पीड़िता की उम्र माना जाना चाहिए। इस आधार पर कोर्ट ने पीड़िता की उम्र 17 साल मानी।

कोर्टरूम में दलीलें: “सहमति” बनाम “कानून”

याचिकाकर्ता के वकील नीरज कुमार झा ने तर्क दिया कि यह पूरी तरह से एक आपसी सहमति का मामला है। उन्होंने कोर्ट का ध्यान सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दिए गए पीड़िता के बयान की ओर खींचा, जिसमें उसने स्वीकार किया था कि वह आरोपी से प्यार करती है और अपनी मर्जी से उसके साथ आगरा गई थी। क्रॉस-एग्जामिनेशन में भी पीड़िता ने अपनी स्वेच्छा से जाने की बात कबूली थी।

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दूसरी ओर, सरकारी वकील (APP) तरंग श्रीवास्तव और पीड़िता की वकील ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता नाबालिग थी, इसलिए उसकी सहमति कानूनन मान्य नहीं है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए अपराध की गंभीरता पर जोर दिया।

हाईकोर्ट का निर्णय: ‘वास्तविक जीवन’ के हालात अहम

दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस महाजन ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने माना कि कानूनी तौर पर नाबालिग की सहमति का बचाव नहीं लिया जा सकता, लेकिन जमानत के स्तर पर व्यावहारिक पहलुओं को देखा जाना चाहिए।

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:

“निस्संदेह, घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी, इसलिए यौन संबंधों के लिए उसकी सहमति (यदि कोई थी) का कानून की नजर में कोई मूल्य नहीं होगा। लेकिन उसकी उम्र 17 वर्ष मानते हुए, प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि पीड़िता पर्याप्त परिपक्वता और बौद्धिक क्षमता रखती थी। याचिकाकर्ता के साथ उसका प्रेम संबंध उन कारणों में से एक है जो जमानत देने के पक्ष में संतुलन बनाता है।”

कोर्ट ने धर्मेंद्र सिंह बनाम स्टेट (2020) और रियाज बनाम स्टेट (2024) के फैसलों का भी जिक्र किया, जिनमें कहा गया है कि किशोरों के बीच प्रेम संबंधों के मामलों को अक्सर ‘लीगल ग्रे एरिया’ में देखा जाता है और ऐसे मामलों में कानून का दुरुपयोग वास्तविक प्रेम कहानियों पर भारी नहीं पड़ना चाहिए।

फैसला

कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि आरोपी लगभग 2 साल 5 महीने से जेल में है और सभी मुख्य गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं, इसलिए सबूतों से छेड़छाड़ की संभावना नहीं है। इसके अलावा, आरोपी का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है।

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इन तथ्यों को देखते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को 25,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने शर्त रखी कि आरोपी बिना सूचना के शहर नहीं छोड़ेगा और जांच अधिकारी के संपर्क में रहेगा।

केस विवरण (Case Details)

  • केस टाइटल: वरुण कुमार सिंह बनाम स्टेट (एसएचओ राजेंद्र नगर)
  • केस नंबर: बेल एप्लीकेशन 3015/2025 (BAIL APPLN. 3015/2025)
  • कोरम: माननीय जस्टिस विकास महाजन

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