झूठे विवाह वादे पर शारीरिक संबंध बनाने का मामला नहीं, केवल निराशा का भाव है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बीएनएस की धारा 69 के तहत दर्ज एफआईआर रद्द की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में कहा है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 का उद्देश्य धोखाधड़ी को दंडित करना है, न कि केवल रिश्ते टूटने से उत्पन्न निराशा को। कोर्ट ने यह कहते हुए एफआईआर रद्द कर दी कि दोनों पक्षों में विवाह का आपसी समझौता था, न कि एकतरफा झूठा वादा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 69 केवल तब लागू होती है जब शारीरिक संबंध धोखे या विवाह के झूठे वादे से बनाए गए हों। आपसी सहमति से बने संबंध और बाद में किसी कारणवश विवाह का न हो पाना, इस धारा के तहत अपराध नहीं बनाता।

गौतम बुद्ध नगर स्थित नोएडा के सेक्टर 63 थाने में 24 दिसंबर 2023 को एफआईआर दर्ज की गई थी। इसमें शिकायतकर्ता महिला (चौथी प्रतिवादी) ने प्रथम याचिकाकर्ता नीलेश रामचंदानी, उनके पिता और एक अन्य पर विवाह के झूठे वादे पर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया था। इसमें बीएनएस की धारा 69 समेत अन्य धाराएं लगाई गई थीं।

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याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर रद्द करने की मांग की और अंतरिम राहत के रूप में गिरफ्तारी पर रोक लगाने की भी गुहार लगाई।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की खंडपीठ ने सुनवाई के बाद कहा:

“हम निश्चित रूप से इस मत पर हैं कि बीएनएस की धारा 69 धोखाधड़ी को दंडित करती है, निराशा को नहीं।”

कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों में विवाह को लेकर सहमति थी और किसी एक पक्ष ने झूठा वादा कर संबंध नहीं बनाए थे।

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“इस मामले में यह स्पष्ट है कि दोनों के बीच विवाह का समझौता था। प्रथम याचिकाकर्ता ने विवाह का कोई झूठा या एकतरफा वादा नहीं किया था।”

कोर्ट ने एफआईआर दर्ज कराने के समय को भी संदिग्ध माना और कहा कि:

“एफआईआर उस समय दर्ज कराई गई जब प्रथम याचिकाकर्ता ने विवाह संभव न होने का विचार किया।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 69 के तहत अपराध स्थापित करने के लिए दो तत्व आवश्यक होते हैं:

  1. महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाना
  2. ऐसा संबंध किसी धोखाधड़ी या विवाह के झूठे वादे के कारण बना हो, जिसमें विवाह करने की मंशा न हो
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इस मामले में इन दोनों तत्वों की पूर्ति नहीं होती, इसलिए यह धारा लागू नहीं होती।

कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 को पारित आदेश में बीएनएस की धारा 69 के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया। हालांकि, अन्य धाराओं के अंतर्गत यदि कोई जांच लंबित है तो वह जारी रह सकती है, लेकिन तब तक याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक रहेगी।

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