सुरक्षित फैसलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: झारखंड हाईकोर्ट को फटकार, कहा- यह न्याय व्यवस्था की एक ‘पहचानी गई बीमारी’

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हाईकोर्टों द्वारा महीनों तक फैसले सुरक्षित रखने और उन्हें सार्वजनिक न करने की प्रथा पर कड़ी नाराजगी जताई है। चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने इसे एक “पहचानी गई बीमारी” (identifiable ailment) करार दिया, जिसे जड़ से खत्म करना अनिवार्य है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय मिलने में इस तरह की देरी बर्दाश्त नहीं की जा सकती।

यह टिप्पणी झारखंड हाईकोर्ट से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान आई। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि हाईकोर्ट ने 4 दिसंबर, 2025 को एक रिट याचिका खारिज करते हुए मौखिक रूप से फैसला सुनाया था, लेकिन दो महीने बाद भी लिखित निर्णय अपलोड नहीं किया गया है।

चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमल बागची और जस्टिस विपुल एम पांचोली की पीठ ने इस समयसीमा पर गंभीर चिंता व्यक्त की। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने इस देरी को न्यायिक व्यवस्था की विफलता बताया।

अदालत में दलील देते हुए रोहतगी ने कहा, “ऐसा लगता है कि केवल मौखिक आश्वासन दिए जा रहे हैं… इस पर कड़ा संदेश जाना चाहिए। यह कानून की गरिमा के साथ खिलवाड़ करने जैसा है।”

इन चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने कहा कि न्यायपालिका में मोटे तौर पर दो तरह के जज होते हैं। उन्होंने बताया कि जहां कई जज बेहद मेहनती हैं और दर्जनों मामलों की सुनवाई करते हैं, वहीं कुछ जज मामले सुरक्षित रखने के बाद फैसला नहीं सुनाते।

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चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की, “हम किसी व्यक्ति विशेष पर बात नहीं कर रहे हैं। यह न्यायपालिका के सामने एक चुनौती है और एक ऐसी बीमारी है जिसकी पहचान हो चुकी है। इसका इलाज कर इसे खत्म करना होगा, इसे फैलने की अनुमति नहीं दी जा सकती।” उन्होंने उस चलन की भी आलोचना की जहां मामले की पूरी सुनवाई के बाद उसे फिर से ‘निर्देशों’ (further directions) के लिए सूचीबद्ध कर दिया जाता है।

अपने 15 साल के हाईकोर्ट जज के कार्यकाल का अनुभव साझा करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि उन्होंने कभी भी किसी फैसले को तीन महीने से ज्यादा सुरक्षित नहीं रखा।

इस समस्या के व्यापक समाधान के लिए चीफ जस्टिस ने घोषणा की कि वह जल्द ही सभी हाईकोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों के साथ बैठक करेंगे। उन्होंने कहा, “हम इस मुद्दे को अन्य एजेंडों के साथ चर्चा में शामिल करेंगे। हम इसका समाधान खोजने की कोशिश करेंगे ताकि इस तरह की टालने योग्य मुकदमेबाजी खत्म हो सके।”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि झारखंड हाईकोर्ट द्वारा 4 दिसंबर के फैसले को अपलोड करने में देरी का “कोई ठोस कारण” नजर नहीं आता। पीठ ने निर्देश दिया कि अगले सप्ताह के अंत तक फैसले की पूरी कॉपी संबंधित वकील को उपलब्ध कराई जाए।

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गौरतलब है कि नवंबर 2025 में भी शीर्ष अदालत ने सभी हाईकोर्टों को सुरक्षित फैसलों की समयसीमा पर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट लगातार इस बात की निगरानी कर रहा है कि फैसलों की प्रमाणित प्रतियों में तीन तारीखें अनिवार्य रूप से दर्ज हों: फैसला सुरक्षित रखने की तारीख, सुनाने की तारीख और अपलोड करने की तारीख।

इस मामले की अगली सुनवाई 16 फरवरी से शुरू होने वाले सप्ताह में होगी।

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